मेरठ की मशहूर पहेली

मेरठ

 27-01-2018 10:28 AM
विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

लोक कथायें, पहेलियाँ, लोकोक्तियाँ आदि समाज के अभिन्न अंग हैं, इनसे समाज के विभिन्न पहलुओं को देखा व समझा जा सकता है। पहेलियों का स्थान भारतीय समाज में अत्यन्त महत्वपूर्ण है तथा इनसे कई कहानियाँ भी उद्धृत हुई हैं, पंचतंत्र में भी पहेलियों का एक महत्वपूर्ण स्थान है। ऐसी ही एक पहेली और उससे सम्बन्धित एक कहानी मेरठ में कई सदियों से चली आ रही है, वर्तमान काल में पहेलियों का रंग मेरठ से हटते जा रहा है पर कहीं-कहीं कोनो में आज भी ये पहेलियाँ जिन्दा हैं। देवर को खाना परोसकर देने के बाद भाभी घड़े से पानी लेने गयी तो पाया कि घड़े में पानी नहीं है। इसे अनुचित समझकर और देवर के कुपित होने की आशंका से भयभीत भाभी ने उसे बातों में लगाना चाहा। भाभी ने कहा: देवर: खाना खाने से पहले मेरी बात बताओ- वही नाम पेड़ का, वही नाम फल का, फल का है कुछ और मेरी बात बताकर देवर, टुकड़ा खाओ तोर। देवर इस पहेली का उत्तर सोचने लगा और भाभी घड़ा लेकर पानी लाने हेतु जाने लगी तभी देवर ने भी अपनी पहेली दाग दी और कहा- आकाश है बाकी झोंपड़ी, पाताल धरे हैं अण्डे। मेरी बात बताकर भाभी, तभी उठाना हण्डे। अब भाभी भी वचनबद्ध हो गयी और दोनों एक-दूसरे की पहेली का उत्तर खोजने लगे। तनिक देर बाद घर में माँ और बेटी भी आ गयीं और दोनों देवर-भाभी के इस असमंजस को आश्चर्य से देखने लगीं। माँ के पूछने पर बेटे ने सारी कथा कह सुनायी। सारी बात सुनकर माँ ने कहा- वाके खाये से हाथी झूमे, तेली पेलै घानी। तू तो भैया रोटी खा लें, ये भर लावे पानी।। इतना सुनकर बेटी से भी चुप न रहा गया और उसने भी कह दिया- एक अचंभा मैंने देखा, सुनले मेरे बीरा। उसी पेड़ पर मैंने देखे, गुड़, बैंगन और जीरा।। चारों व्यक्तियों ने एक दूसरे से जो पूछा उसका उत्तर समान ही है। उत्तर है महुआ। इसी प्रकार से समय व्यतीत करने के लिये व हसीं ठिठोली के लिये पहेलियों का एक बड़ा योगदान हुआ करता था समाज व परिवार में आधुनिकता की आँधी व व्यस्तता में पहेली परम्परा का पूर्ण रूप से लोप हो गया। 1. राजभाषा पत्रिका, मेरठ जनपद की एक कथामूलक पहेली, डॉ रामानन्द शर्मा, रज़ा पुस्तकालय, रामपुर



RECENT POST

  • तीन लोक का वास्तविक अर्थ
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     18-04-2019 12:24 PM


  • यिप्रेस (Ypres) के युद्ध में मेरठ सैन्य दल ने भी किया था सहयोग
    उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

     17-04-2019 12:50 PM


  • मेरठ का खूबसूरत विवरण जॉन मरे के पुस्तक में
    भूमि प्रकार (खेतिहर व बंजर)

     16-04-2019 04:10 PM


  • पतन की ओर बढ़ता सर्कस
    द्रिश्य 2- अभिनय कला

     15-04-2019 02:37 PM


  • 'अतुल्य भारत' की एक मनोरम झलक
    द्रिश्य 1 लेंस/तस्वीर उतारना

     14-04-2019 07:20 AM


  • रामायण और रामचरितमानस का तुलनात्मक विवरण
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     13-04-2019 07:30 AM


  • शहीद-ए-आज़म उद्धम सिंह का बदला
    उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

     12-04-2019 07:00 AM


  • टेप का संक्षिप्‍त इतिहास
    वास्तुकला 2 कार्यालय व कार्यप्रणाली

     11-04-2019 07:05 AM


  • क्या तारेक्ष और ग्लोब एक समान हैं?
    पंछीयाँ

     10-04-2019 07:00 AM


  • क्या भारत में भी राजनेताओ के कार्य सत्र सीमित होना चाहिए ?
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     09-04-2019 07:00 AM