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समय आ गया है, पर्यावरण अध्ययन को अनिवार्य तथा अनुकूल करने का

मेरठ

 21-04-2022 08:35 AM
जलवायु व ऋतु

यदि हमें वास्तव में पर्यावरण प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसे बेहद जटिल और संवेदनशील मुद्दों को सुलझाना है, तो "बच्चे" इस संदर्भ में सबसे बड़े हीरो साबित हो सकते हैं! हम सभी जानते हैं की, बच्चे या विद्यार्थी, कच्ची मिट्टी की भांति होते हैं। आप उन्हें जिस आकार में ढालते हो, वे उस आकार में ढल जाते हैं।" किसी भी तथ्य या सत्य को, बच्चा (कच्ची मिट्टी) इनती आसानी से स्वीकार कर लेंगे तथा समझ जायेगे, जितनी आसानी से पक्के घड़ों अर्थात व्यसकों को समझने में कई दशकों का समय लग जायेगा। इसलिए आज हमने पर्यावरण को जिस स्तर तक संवेदनशील बना दिया है, उसे देखकर यही लगता है की, आज के बच्चे ही हमारे पर्यावरण को आनेवाले समय बचा पाएंगे! इसलिए अब समय आ गया है की, पूरी दुनिया में "पर्यवारण अध्ययन (environmental studies)" को सभी के लिए अनिवार्य विषय के रूप में निर्धारित कर देना चाहिए। 20वीं सदी के दौरान, वैश्विक स्तर पर पृथ्वी की सतह के औसत तापमान में लगभग, 1.08°F (0.6°C) की वृद्धि हुई। वर्ष 2000 के बाद से 0.25°F (0.14°C) से अधिक की अतिरिक्त वार्मिंग (गर्मी) को मापा गया है। हालांकि आंकड़ों को देखकर आपको, कुल वृद्धि कम लग सकती है, लेकिन यह पिछले 10,000 वर्षों में परिवर्तनों की तुलना में परिवर्तन की एक असाधारण तीव्र दर को दर्शाती है।
जलवायु वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि, 21वीं सदी में भी पृथ्वी के तापमान में वृद्धि जारी रहेगी, जो 20वीं सदी की तुलना में बहुत अधिक हो सकती है। इसके प्रत्याशित परिणामस्वरूप वैश्विक समुद्र स्तर में वृद्धि, गर्म लहरों , सूखे और बाढ़ की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि हो सकती है, या हो रही है। ये परिवर्तन आर्थिक समृद्धि, मानव और पर्यावरणीय स्वास्थ्य तथा राष्ट्रीय सुरक्षा सहित, मानव समाज के लगभग हर पहलू को प्रभावित करेंगे। वैज्ञानिक अवलोकन और जलवायु मॉडल के परिणाम बताते हैं कि, मानव गतिविधियां, विश्व स्तर पर पृथ्वी के तापमान में हो रही, अधिकांश वृद्धि का प्राथमिक कारण हैं। अतः आज समाज को ऐसे नागरिकों की आवश्यकता है जो, जलवायु प्रणाली को समझें और उस ज्ञान को सक्रिय सदस्यों के तौर पर अपने करियर तथा अपने समुदायों में लागू करना जानते हों। ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स (Global Climate Risk Index 2021) की रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौती, जलवायु परिवर्तन है! भारत 2019 में जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभावों को झेलने वाला सातवां सबसे अधिक प्रभावित देश था। जलवायु प्रभाव विकासशील देशों के लोगों को असमान रूप से प्रभावित करते हैं, जिससे उनके जीवन और आजीविका को भारी खतरा बना रहता है। भारत उन चुनिंदा देशों में से एक है, जहां औपचारिक शिक्षा में पर्यावरण शिक्षा (learning environment) अनिवार्य रखी गई है। शैक्षिक कंपनी ब्रेनली (brainly) द्वारा हाल ही में किए गए, एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 79% भारतीय छात्रों को लगता है कि, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण का अध्ययन करना वास्तव में महत्वपूर्ण है। लेकिन येल विश्वविद्यालय (Yale University) के अनुसार, 65% भारतीय आबादी, जलवायु परिवर्तन को एक समस्या के रूप में नहीं जानती है। शेष 35% में से (ज्यादातर 80% शिक्षित लोग) इसे एक गंभीर खतरे के रूप में देखते हैं। इसलिए नई पीढ़ी को जलवायु परिवर्तन और अन्य पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्यक ज्ञान, जागरूकता और कौशल देना, आज सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है। औपचारिक शिक्षा में पर्यावरण शिक्षा को शामिल करने के लिए भारत का पहला प्रयास 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (national education policy) के तहत किया गया था। 2005 में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा ने पर्यावरणीय मुद्दों के एकीकरण पर जोर दिया और परियोजना-आधारित शिक्षा की सिफारिश की गई। 2016 में, यूजीसी (UGC) ने सभी विषयों से स्नातक करने हेतु, पर्यावरण अध्ययन पर छह महीने का अनिवार्य पाठ्यक्रम शुरू किया। भारत उन चुनिंदा देशों में से एक है, जहां औपचारिक शिक्षा के सभी स्तरों पर पर्यावरण शिक्षा अनिवार्य रखी गई है। लेकिन हमारे स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाये जाने वाले विषय जलवायु परिवर्तन की तात्कालिक चिंताओं से बहुत दूर हैं। वे ज्यादातर पर्यावरण कानूनों, वन्यजीव संरक्षण, सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और भारत में उगाई जाने वाली घास जैसी सूचनाओं पर केंद्रित होते हैं। वे ग्रीनहाउस प्रभावों, जलवायु परिवर्तन से स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं, बदलती जलवायु के प्रभावों और अन्य महत्वपूर्ण विषयों के बारे में चर्चा नहीं करते हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था बनने की दौड़ में प्रदूषण, अधिक जनसंख्या, तेजी से वनों की कटाई, और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन ने भी भारतीय शिक्षा प्रणाली को ऐसे उपभोक्ताओं का उत्पादन करने के लिए बदल दिया है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था में योगदान दे सकते हैं। विद्यालय में दी गई शिक्षाएं, भविष्य की आनेवाली पीढ़ियों को ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव, क्लोरोफ्लोरोकार्बन के प्रभावों, संसाधनों की कमी को रोकने, प्रदूषण को कम करने और वन्यजीवों की रक्षा करने की अहमियत को समझाने में, महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। हालांकि केंद्रीय (CBSE, ICSE) या विभिन्न राज्य बोर्ड, के अंतर्गत पर्यावरण शिक्षा केवल तथ्यों और आंकड़ों तक सीमित है, जिसका व्यावहारिक मूल्य बहुत कम माना जाता है। ऐसे में छात्र इस मामले की गंभीरता को नहीं समझ पा रहे हैं। हमें राष्ट्रीय, राज्य, शहर या जिला स्तर पर विशिष्ट पर्यावरणीय समस्याओं पर जोर देने की आवश्यकता है, ताकि छात्र मुद्दों को समझ सकें और उनके प्रति जागरूक हो सकें। उदाहरण के तौर पर यदि बात हमारे जलाशयों में प्लास्टिक प्रदूषण के बारे में हो रही है तो, उन्हें सीखने के दौरान तालाब का दौरा भी करना चाहिए, जिससे वे तात्कालिकता को बेहतर ढंग से समझ पाएंगे। जब छात्रों को पता चलेगा कि पर्यावरण के मुद्दे, उनके जीवन और भविष्य से कितनी निकटता से जुड़े हुए हैं, तभी वह समाधान की कल्पना करने के लिए प्रेरित होंगे। इसके लिए, छात्रों को नागरिक विज्ञान और अनुभवों से सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। दूसरा तरीका यह है कि, बच्चों के सामने पर्यावरणविदों, जलवायु परिवर्तन कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों को उसी प्रकार प्रतीक के रूप में पेश किया जाए, जिस प्रकार जवाहरलाल नेहरू और एम.के. गांधी अब किताबों में पढ़े जाते हैं। जलवायु परिवर्तन एक अंतर-पीढ़ीगत (inter-generational) मुद्दा है, अतः पर्यावरण और जलवायु शिक्षा के माध्यम से छात्रों के भीतर जलवायु कौशल को विकसित करने की आवश्यकता है। शिक्षकों को भी पाठ्यपुस्तकों से परे सिमुलेशन, फील्ड ट्रिप (Simulation, Field Trip), पर्यावरणविदों का दौरा करना और व्याख्याताओं को आमंत्रित करना चाहिए जो, छात्रों को जमीनी वास्तविकता जैसे भारत के अभयारण्यों, नदियों या शहर की जल निकासी प्रणालियों के बारे में शिक्षित कर सकते हैं। छात्रों के बीच जलवायु साक्षरता विकसित करने के लिए, केंद्रीय तथा राज्य शिक्षा विभाग विज्ञान या सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में जलवायु परिवर्तन पर अध्यायों को शामिल कर सकते हैं। इसे संबोधित करने के लिए हाल ही में घोषित राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी 2020) को पर्याप्त रूप से संशोधित किया जा सकता है। महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य है जिसने पहले से ही जनसंख्या, ज्ञान वृद्धि, संसाधन उपयोग, ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन से संबंधित विषयों को अपने उच्च माध्यमिक शिक्षा विषयों में शामिल किया गया है। जलवायु शिक्षा को स्कूल स्तर से आगे और विभिन्न विषयों के स्नातक पाठ्यक्रमों, विशेष रूप से तकनीकी पाठ्यक्रमों में ले जाने की आवश्यकता है। यह छात्रों को हरित-नौकरियों के लिए तैयार कार्यबल तथा एक हरित उपभोक्ता आंदोलन के निर्माण के लिए आवश्यक कौशल और तकनीकों से लैस करेंगे। पर्यावरण और जलवायु शिक्षा को स्कूल से लेकर कॉलेज स्तर तक के मुख्य पाठ्यक्रम में शामिल करने से भारत के युवा एक संतुलित, हरित और सुरक्षित कल की दिशा में आगे बढ़ने में सक्षम होंगे।

संदर्भ
https://bit.ly/3JQLepm
https://bit.ly/3EqcN7V
https://tmsnrt.rs/3EDwCJ3

चित्र संदर्भ
1. पर्यावरण अअध्ययन करते बच्चों को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
2. केरल विश्वविद्यालय परिसर कार्यवतम - पर्यावरण अध्ययन विभाग को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
3. भूमि प्रदूषण: कारणों, प्रभावों और समाधानों के परिचय को दर्शाता एक चित्रण ( Explain that Stuff)
4. पर्यावरण अध्ययन को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
5. शांतिनिकेतन में पर्यावरण अध्ययन को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)

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