भारत और अमेरिका के संबंध

मेरठ

 18-11-2020 01:57 AM
सिद्धान्त 2 व्यक्ति की पहचान

भारत और अमेरिका दोनों देशों का इतिहास कई मामलों में समान रहा है। दोनों ही देशों ने औपनिवेशिक सरकारों के खिलाफ संघर्ष कर स्वतंत्रता प्राप्त की (अमेरिका वर्ष 1776 और भारत वर्ष 1947) तथा स्वतंत्र राष्ट्रों के रूप में दोनों ने शासन की लोकतांत्रिक प्रणाली को अपनाया। उस समय ग्रेट ब्रिटेन और फ्रांस का कब्जा अमेरिका और साथ ही भारतीय उपमहाद्वीप में राज्य क्षेत्रों पर था। 1778 में, जब फ्रांस ने ब्रिटेन के खिलाफ युद्ध की घोषणा की, तो भारत में ब्रिटिश और फ्रांसीसी उपनिवेशों के बीच लड़ाई शुरू हो गई। इसने द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध की शुरुआत को बढ़ावा दिया। इस युद्ध के बीच ही हैदर अली की मृत्यु हो गई थी, किंतु बाद में दोनों पक्ष कमजोर पड़ने लगे, दोनों सरकारों ने समझ लिया कि आगे युद्ध बढ़ाना उनकी सामर्थ्य के बाहर है। अत: उन्होने 1783 ई. में सन्धि कर ली, जो पेरिस की संधि कहलाती है। पेरिस की संधि पर अंततः 3 सितंबर 1783 को हस्ताक्षर किए गए थे और कुछ महीनों बाद अमेरिकी कांग्रेस द्वारा इसकी पुष्टि की गई थी, जिसके आधार पर दोनों पक्षों ने एक दूसरे के भू-भाग वापस कर दिए।
ब्रिटिश राज के समय में भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच रिश्ते कुछ खास नहीं थे। उस समय दोनों के रिस्तों के बीच मधुरता आने के लिये स्वामी विवेकानंद ने 1893 में विश्व मेले के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका के शिकागो (Chicago) में विश्व धर्म संसद में योग और वेदांत का प्रचार किया। जबकि रूजवेल्ट (Roosevelt) 1933 में अमेरिका के राष्ट्रपति थे और 1945 में उनकी मृत्यु तक, उन्होंने भारत के साथ घनिष्ठ और सहायक संबंध बनाए रखे। 1930 और 1940 के दशक के प्रारंभ में, रूजवेल्ट ने ब्रिटेन (Britain) का सहयोगी होने के बावजूद भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन किया। परंतु द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सब कुछ बदल गया, जब भारत जापान के खिलाफ युद्ध में अमेरिकी चीन बर्मा इंडिया थियेटर (सीबीआई) (American China Burma India Theater (CBI)) का मुख्य आधार बन गया। इस दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट और चर्चिल (Franklin D. Roosevelt and Churchill) (प्रसिद्ध कूटनीतिज्ञ और प्रखर वक्ता) के बीच भारत की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर तनाव पैदा हो गया। चर्चिल ने भारत की स्वतंत्रता का प्रस्ताव सख्ती से खारिज कर दिया जबकि रूजवेल्ट भारत को ब्रिटिशों से छुटकारा दिलाने में लगे रहे। अंतत: भारत को 1947 में आजादी मिली, परंतु भारत की आज़ादी के बाद शीतयुद्ध के दौर में अमरीका से संबंध खिंचाव में बंधे रहे हैं। 1949 में अमरीका की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री, अमरीकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन (Harry Truman) के मेहमान बने। इस बीच नेहरू (Nehru) और उनके शीर्ष सहयोगी वी. के. कृष्ण मेनन (V. K. Krishna Menon) ने चर्चा की कि क्या भारत को संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ आर्थिक और सैन्य शक्ति का निर्माण करना चाहिए? द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत अमेरिका विश्व की सर्वोच्‍च शक्ति बनकर उभरा, जबकि द्वितीय विश्व युद्ध के पश्‍चात भारत (India) को आजादी मिली। स्वतंत्र भारत में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को अपनाया गया एवं गुटनिरपेक्ष विदेश नीति अपनाई गयी और भारत विकासशील देशों में मुख्य लोकतांत्रिक राज्य बना। अमेरिकी विदेश नीति का मूल उद्देश्य साम्यवाद को नियंत्रित एवं संतुलित करना था। अतः अमेरिका ने साम्यवाद को नियंत्रित करने में भारत से सहायता की अपेक्षा की, जबकि भारत ने स्वतंत्र एवं स्वायत्त विदेश नीति अपनाई। भारत के आरंभिक विकास में अमेरिका ने अत्यधिक आर्थिक एवं तकनीकी सहायता प्रदान की एवं दोनों देशों की लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के कारण भी संबंध मजबूत हुए। 1974 में परमाणु परीक्षण के साथ भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच सदस्यों के बाद ऐसा करने वाला पहला देश बना। परमाणु परीक्षणों की वजह से अमरीका के साथ अगले दो दशकों तक संबंधों में खिंचाव की नींव पड़ गई। परंतु 1990 के दशक में भारतीय आर्थिक नीति में बदलाव के परिणामस्वरूप भारत और अमेरिका के संबंधों में कुछ सुधार देखने को मिले। अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) के भारतीय प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद, पोखरण में परमाणु हथियार परीक्षण को अधिकृत किया। अमेरिका ने इस परीक्षण की कड़ी निंदा की। इसके बाद मार्च 2000 में, अमेरिकी राष्ट्रपति क्लिंटन (Clinton) ने भारत का दौरा किया, प्रधान मंत्री वाजपेयी के साथ द्विपक्षीय और आर्थिक चर्चा की और प्रशासन के साथ बेहतर राजनयिक संबंधों के लिये, भारत अपने परमाणु हथियारों के विकास की अंतर्राष्ट्रीय निगरानी की अनुमति देने के लिए सहमत हुआ। भारत ने सार्वजनिक उद्यमों को प्राथमिकता दी, जबकि अमेरिका ने निजी उद्यमों को बढ़ावा दिया। 60 के दशक में भारत एवं अमेरिका के संबंध अत्यधिक बेहतर रहे। वर्ष-1962 में भारत-चीन युद्ध में अमेरिका ने भारत का पूर्ण समर्थन किया तथा भारत को तकनीकी एवं आर्थिक सहायता प्रदान की, परंतु भारत एवं अमेरिका के मध्य यह मधुर संबंध ज्यादा दूरगामी सिद्ध नहीं हुआ। क्योंकि वर्ष-1965 के भारत एवं पाकिस्तान युद्ध के बाद अमेरिका ने दोनों देशों को युद्ध के लिए समान रूप से उत्तरदायी माना और भारत के लिए आर्थिक और सैनिक सहायता पर भी प्रतिबंध लगा दिया, जिससे भारत एवं अमेरिकी संबंधों में दूरी बन गई। 1990 के दशक में, भारतीय विदेश नीति में परिवर्तन किए गए, जिसके परिणामस्‍वरूप संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ घनिष्ठ संबंध विकसित हुए।
राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश (George W. Bush) और बराक ओबामा (Barack Obama) के प्रशासन के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका ने भारत के मूल राष्ट्रीय हितों के लिए समर्थन किया और भारतीय चिंताओं की ओर ध्‍यान केंद्रित किया। जॉर्ज डब्ल्यू. बुश प्रशासन के कार्यकाल के दौरान, भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच संबंध मुख्य रूप से इस्लामिक चरमपंथ, ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन को लेकर समय के साथ और अच्छे होते गये। द्विपक्षीय व्यापार और निवेश में वृद्धि, वैश्विक सुरक्षा मामलों पर सहयोग, वैश्विक प्रशासन (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद) के मामलों में निर्णय लेने में भारत का समावेश, व्यापार और निवेश मंचों में उन्नत प्रतिनिधित्व (विश्‍व बैंक (World Bank), आईएमएफ (IMF), एपीईसी (APEC)), बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं (एमटीसीआर (MTCR), वासेनार अरेंजमेंट (Wassenaar Arrangement), ऑस्ट्रेलिया ग्रुप (Australia Group)) में प्रवेश और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में प्रवेश के लिए समर्थन और प्रौद्योगिकी साझाकरण व्यवस्था के माध्यम से संयुक्त विनिर्माण महत्वपूर्ण भारत और अमेरिका के मध्‍य मील का पत्थर बन गए हैं और भारत और अमेरिकी संबंध तीव्रता से मजबूती की ओर आगे बढ़ रहे हैं। 2016 में, भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका ने लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ़ एग्रीमेंट (Logistics Exchange Memorandum of Agreement) पर हस्ताक्षर किए और भारत को संयुक्त राज्य अमेरिका का एक प्रमुख रक्षा भागीदार घोषित किया। हाल ही में भारत ने हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वाइन (Hydroxychloroquine), जिसे ट्रंप (Trump) कोरोना (Corona) के लिए रामबाण समझ रहे थे, के निर्यात पर रोक लगाने का निर्णय लिया, किंतु ट्रंप की भारत को धमकी के बाद भारत को अपना निर्णय बदलना पड़ा। वर्ष 2017 में भारत अमेरिका के मध्‍य द्विपक्षीय व्यापार (वस्‍तुओं और सेवाओं दोनों में) 9.8% की वृद्धि के साथ $126.1 बिलियन तक पहुंच गया। अमेरिका को भारत का निर्यात $76.7 बिलियन पर, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका का भारत में निर्यात $49.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर था। भारत एवं अमेरिकी संबंध को प्रगाढ़ करने और नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में 40 लाख से भी ज्‍यादा भारतीय मूल के लोगों का निर्णायक योगदान है। अब भारतीय मूल के लोग अमेरिकी विदेश नीति को अत्यधिक प्रभावित कर रहे हैं। दिसंबर 2019 में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने वाशिंगटन (Washington) में अमेरिकी राज्य सचिवों और रक्षा और उनके भारतीय समकक्षों के नेतृत्व में दूसरी 2+2 मंत्रिस्तरीय वार्ता की मेजबानी की, जिस पर दोनों पक्षों ने एक प्रमुख रक्षा भागीदार, इंटरऑपरेबिलिटी परीक्षण (Interoperability Testing), और सूचना साझाकरण के रूप में भारत की स्थिति की पुष्टि की और समुद्री सुरक्षा में सहयोग को गहरा किया। जबकि 2 + 2 संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के बीच प्रमुख संवाद तंत्र के रूप में कार्य करता है, इसमें तीस से अधिक द्विपक्षीय संवाद और कार्य समूह हैं, जो अंतरिक्ष और स्वास्थ्य सहयोग से लेकर ऊर्जा और उच्च प्रौद्योगिकी व्यापार तक, मानवीय प्रयासों के सभी पहलुओं का विस्तार करते हैं। इनमें यूएस-इंडिया काउंटरटेरिज्म जॉइंट वर्किंग ग्रुप (U.S.-India Counterterrorism Joint Working Group) शामिल है, जिसे 2000 में स्थापित किया गया था और यह सरकारी संवादों के लिए हमारी सरकार के साथ-साथ स्ट्रैटेजिक एनर्जी पार्टनरशिप (Strategic Energy Partnership), साइबर डायलॉग (Cyber Dialogue), सिविल स्पेस वर्किंग ग्रुप (Civil Space Working Group), ट्रेड पॉलिसी फोरम (Trade Policy Forum), डिफेंस पॉलिसी ग्रुप (Defense Policy Group) आदि शामिल हैं। भारत और अमेरिका संयुक्त राष्ट्र, जी-20, दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन (आसियान (ASEAN)), अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन सहित बहुपक्षीय संगठनों में निकट सहयोगी है। अमेरिका ने 2021 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के दो साल के कार्यकाल के लिए अपनी सहमती व्‍यक्‍त की, और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार का समर्थन किया है, जिसमें भारत एक स्थायी सदस्य के रूप में शामिल किया जा सके। भारत आसियान संवाद, आर्थिक सहयोग और विकास संगठन में भी भागीदार है, और अमेरिकी राज्यों के संगठन के लिए एक पर्यवेक्षक है। भारत हिंद महासागर रिम एसोसिएशन (Indian Ocean Rim Association (IORA)) का सदस्य भी है, जिस पर संयुक्त राज्य अमेरिका एक संवाद भागीदार है। 2019 में, भारत संयुक्त राज्य अमेरिका भारत-प्रशांत क्षेत्र में स्थायी बुनियादी ढांचे पर सहयोग का विस्तार करने के लिए आपदारोधी बुनियादी ढांचे के लिए बने गठबंधन में शामिल हो गया। भारत और अमेरिका के बीच वर्तमान द्विपक्षीय संबंधों का लाभ उठाते हुए भारत को नवीन तकनीकी, रक्षा और अंतरिक्ष जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में अमेरिका सहित अन्य देशों से भी व्यापक विदेशी निवेश को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिये।

संदर्भ:
https://en।wikipedia।org/wiki/India%E2%80%93
https://www।state।gov/u-s-relations-with-india/
चित्र सन्दर्भ:
पहले चित्र में भारत अमेरिका के झंडों को पज़ल (Puzzle) के सांकेतिक रूप में प्रस्तुत किया गया है। (Pixabay)
दूसरे चित्र में भारत और अमेरिका के परस्पर संबंधों का सांकेतिक चित्रण है। (Prarang)
तीसरे चित्र में भारत द्वारा अमेरिका के साथ बढ़ते और चीन के साथ घटते व्यापर को दर्शाया गया है। (commerce.gov.in)


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