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कोरोना का नए शहरवाद पर प्रभाव

मेरठ

 27-10-2020 01:10 AM
नगरीकरण- शहर व शक्ति

पिछले कुछ महीनों से फैली कोरोना महामारी ने विश्‍व परिदृश्‍य को बदलकर रख दिया है, और इसका प्रभाव इसके समाप्‍त होने के बाद भी लंबे समय तक रहने वाला है या हम कह सकते हैं कि समाज या फिर उद्योंगों में अब जो भी भावी परिवर्तन किए जाएंगे, वह सभी कोविड-19 को ध्‍यान में रखकर किए जाएंगे। ताकि भविष्‍य में फिर से यदि कोई ऐसी परिस्थिति बनती है, तो उसकी संभावित हानि से बचा जा सके। यदि हम इतिहास के पन्‍नों को खोलकर देखें तो महामारी के कारण ना जाने कितने गांव के गांव और शहर के शहर नष्‍ट हो गए। जिसके परिणामस्‍वरूप आगे चलकर जो भी शहर निर्माण किए गए, उसमें सांस्‍कृतिक और तकनीकी पहलुओं के साथ-साथ म‍हामारियों को भी ध्‍यान में रखा गया। 19वीं शताब्दी में हैजा की महामारियों ने आधुनिक शहरी स्वच्छता प्रणालियों की शुरुआत की। औद्योगिकरण के दौरान यूरोप में भीड़-भाड़ वाली मलिन बस्तियों में आवास नियम इस प्रकार बनाए गए, जिससे श्‍वास से संबंधित बिमारियों से बचा जा सके। एक अमेरिकी पत्रकार, लेखिका और कार्यकता जेन जैकब्स (Jane Jacobs) ने शहरों के ऊपर अध्‍ययन किया, 20वीं शताब्‍दी के शहरी विचारकों में इनका नाम सबसे ऊपर आया। अपने अध्‍ययन में इन्‍होंने शहर के वास्‍तविक पहलुओं को उजागर किया। जिन्‍हें नए शहरवाद के ढांचे में शामिल किया गया।
नया शहरवाद एक पर्यावरण के अनुकूल शहरों का समर्थन करता है, जिसमें चलने योग्‍य मोहल्‍ले हों, जहां किफायती घर और रोजगार के पर्याप्‍त अवसर हों। इसकी शुरूआत 1980 के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका से हुयी थी, जिसने आगे चलकर अचल संपत्ति के विकास, शहरी नियोजन और नगरपालिका भूमि-उपयोग रणनीतियों के कई पहलुओं को प्रभावित किया। नया शहरीवाद शहरी फैलाव से जुड़ी बीमारियों को दूर करने का प्रयास करता है। वर्तमान में फैले कोरोना वायरस ने शहरी जीवन में काफी बदलाव ला दिया है। अक्‍सर घूमने-फिरने वाले लोग अब तभी घर से बाहर निकल रहे हैं जब बहुत जरूरी हो। वर्क फ्रॉम होम (Work From Home) सामान्‍य बात हो गयी है। जहां लोग अच्‍छे रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करते थे, वहीं आज बड़ी मात्रा में अपनें गांव और कस्‍बों की ओर वापस लौट आए हैं और व्‍यक्तिगत स्‍तर पर स्‍वरोजगार प्रारंभ कर दिया है। वहीं छोटे श्रमिक जो शहरी मजदूरी पर निर्भर थे उनका जीवन संकट में आ गया है, अब नए शहरवाद के ढांचे में कोरोना द्वारा सिखाए गए अध्यायों को शामिल करना अनिवार्य हो गया है, जिसके लिए नीति निर्मातकों को विभिन्‍न पहलुओं पर ध्‍यान केंद्रित करना होगा.
बुनियादी सेवाओं पर ध्‍यान केंद्रित करना:
शहर में आबादी का घनत्‍व किसी भी महामारी के लिए अनुकूल परिवेश प्रदान करता है, शहरों की अधिकांश जनसंख्‍या तक बुनियादी आवश्‍यकताएं नहीं पहुंच पाती हैं। विश्व संसाधन रिपोर्ट, टुवर्ड्स ए मोर इक्वल सिटी (Towards a More Equal City) ने बताया अधिकांश शहर पानी, आवास और स्वास्थ्य देखभाल जैसी आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति की कमी के कारण कोरोना महामारी से लड़ने में विफल रहे। कुछ स्‍थानों तक पहुंच में असमर्थता के कारण लॉकडाउन का अनुपालन विफल रहा। शहरों को आगे बढ़ाने के लिए शहर की बुनियादी सेवाओं को विभाजित करना होगा।
किफायती घर और खुले सार्वजनिक स्‍थान की व्‍यवस्‍था: पर्याप्‍त सार्वजनिक स्‍थान और किफायती घर का अभाव जनसंख्या घनत्व की समस्या को जन्म देता है। यही कारण था कि 20वीं शताब्दी की शुरुआत में यूरोप में कई आवासीय कानूनों और नियमों को लागू किया गया, जिससे महामारी जैसी घटनाओं को रोका जा सके। कोविड-19 ने हमें इस पर फिर से पुनर्विचार करने के लिए विवश कर दिया है, इसके अस्‍थायी बदलावों से स्‍थायी बदलाव लाया जा सकता है। जिससे लोग सामजिक दूरी रखने के दिशा निर्देशों का पालन कर सकें। इसके लिए किफायती आवास और सार्वजनिक स्थान तक पहुंच में सुधार करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा, अनौपचारिक गली-मोहल्‍लों को सुधारना होगा। अफ्रीका, भारत और दक्षिण पूर्व एशिया शहरों की अगली पीढ़ी को आकार देने के लिए विशेष परिवर्तनों की आवश्‍यकता है।
2050 तक विश्‍व के 2.5 अरब से अधिक लोग शहरों की ओर रूख कर चुके होंगे, जिनमें से 90% अफ्रीका और एशिया से ही होंगे। आज अनुमानित 1.2 अरब शहरवासियों के पास किफायती और सुरक्षित आवास नहीं है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए भावी शहरी विकास परिर्वतन कुछ विशेष नियोजित नहीं रहने वाला है। जिसके चलते 2025 तक 1.2 अरब का यह आंकड़ा लगभग 1.6 अरब तक पहुंच जाएगा। इसमें सुधार की आवश्‍यकता है कोविड-19 इसके लिए एक विशेष संकेत है। एकीकृत ग्रीन और ब्लू स्पेस (Green and Blue Spaces) की व्‍यवस्‍था:
कोविड-19 में लॉकडाउन के दौरान जब कुछ शहरी पार्क खुले तो वहां भीड़ का जमावड़ा लग गया। नए शहर नियोजन में जनता के लिए शहर के बीच पर्याप्‍त हरित और जलीय क्षेत्र बनाने की आवश्‍यकता है। जिससे इस प्रकार की आपात स्थिति में भीड़ को नियंत्रित किया जा सके और शहरी आबादी को एक स्‍वच्‍छ ओैर स्‍वस्‍थ जीवन दिया जा सके।
शहरी-क्षेत्रीय योजना में वृद्धि:
शहरों में जो भी घटता है उसका प्रभाव सिर्फ शहरों तक ही नहीं रहता वह आसपास के क्षेत्रों में भी पड़ता है फिर चाहे वह सकारात्‍मक घटना हो या फिर नकारात्‍मक। कोविड-19 इसका प्रत्‍यक्ष उदाहरण है जिसके कारण शहरी जीवन तो प्रभावित हुआ ही इसने ग्रामीण क्षेत्रों की आपूर्ति और उत्पादन श्रृंखला को भी प्रभावित किया है। इस प्रकार के संकट से बचने के लिए नए शहरी विकास को एक बेहतर योजना के साथ आना होगा। हमें अर्थव्यवस्थाओं, ऊर्जा प्रावधान, परिवहन नेटवर्क और खाद्य उत्पादन हेतु एकीकृत शहरी-क्षेत्रीय योजना की आवश्यकता है ताकि यह स्‍तंभ हमारी कमजोरी नहीं ताकत बन सके। अधिक शहरी-स्‍तर और ग्रेन्युलर डेटा (Granular Data)
अब डेटा या आंकड़े मुख्य रूप से राष्ट्रीय स्तर पर एकत्र किए जाते हैं, जबकि किसी भी महामारी की रोकथाम हेतु कई निर्णय स्थानीय स्तर पर लिए जाते हैं। इस संकट की प्रतिक्रिया में शहरों को बड़े आंकड़ों (Big Data) की शक्ति का उपयोग करना चाहिए, जिससे दीर्घकालिक स्थिरता, शहरों को अधिक बारीक, नियमित रूप से अद्यतन आंकड़ों के साथ सशक्त बनाने की आवश्यकता है, जो निर्णय लेने के लिए बेहतर साक्ष्‍य प्रदान कर सकें।
बहुद्देशीय सड़कों का निर्माण:
नए शहरी लोग प्लेसमेकिंग (सार्वजनिक स्थानों की योजना, डिजाइन और प्रबंधन के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण) और सार्वजनिक स्थान को उच्च प्राथमिकता देते हैं। नई शहरी सड़कों को लोगों के लिए डिज़ाइन किया जाना चाहिए ना कि सिर्फ कारों के लिए। जिसमें पैदल चलना, साइकिल चलाना, पारगमन का उपयोग और ड्राइविंग सहित बहुविध परिवहन को समायोजित किया जा सके। इसके साथ ही इन सड़कों में दैनिक वार्तालाप और सार्वजनिक जीवन की मेजबानी करने के लिए प्लाज़ा, वर्ग, फुटपाथ, कैफे और पोर्च होने चाहिए।
नया शहरवाद व्‍यवहारिक होना चाहिए:
नए शहरवाद में व्‍यवहारिकता को महत्‍व दिया जाना चाहिए ना कि काल्‍पनिकता को। जिसको पूर्ण करने के लिए उत्पादन बिल्डरों, छोटे डेवलपर्स, ट्रैफिक इंजीनियर, मूल्यांकनकर्ता और वित्तीय संस्थानों, सार्वजनिक अधिकारियों, नागरिकों और अन्य लोगों को शामिल किया जाना चाहिए, जिससे ‍नियोजित कार्य को पूर्ण किया जा सके।
भारतीय शहरी विस्‍तार विश्‍व के विभिन्‍न शहरी विकास के सिद्धान्‍त के साथ प्रयोग और अनुकूलन के कई अवसर प्रदान करता है। सतत विकास क्षेत्र (SDZ) की अवधारणा भारत के शहरों को घने, मिश्रित उपयोग केंद्रों और बाहर की ओर कम विकास वाले समुदायों में पुनर्गठित करना चाहते हैं। नए शहरीवाद के आदर्शों के अनुरूप, सतत विकास क्षेत्र लोगों के रहने और काम करने वाले क्षेत्रों के एकीकरण से कम होता है। भारत के सतत विकास क्षेत्र के दूरदर्शी जयगोपाल जी. राव ने बताया कि यह भविष्‍य में भारत के आर्थिक विकास को भी गति देगा। सतत विकास क्षेत्र की अवधारणा लाभदायक है। यदि आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्र का निर्माण या विकास घने शहरीकरण से अलग किया जाएगा तो यह निश्चित ही अलगाव या फिर द्वितीय श्रेणी के नागरिकों को वैध बनाता है। यह एक मलीन बस्‍ती के विकास को बाधित करेगा और समाज की जातिवाद जैसी कुप्रथा को बढ़ावा देगा। इस तरह का भेद भाव किसी भी तरह के लोकतांत्रिक देश में अस्‍वीकार्य है।
नया शहरवाद ऐसे स्‍थान का समर्थन करता है जहां लोग खुशहाल स्‍वस्‍थ जीवन जी सकें। इसमें रहने वालों के लिए व्यवसाय, स्थानीय सरकारों और अपने निवासियों के लिए चलने योग्य, जीवंत, सुंदर जगहों का निर्माण किया जाता है। कोई भी व्यक्ति जो एक विशेष स्थान बनाने, पुनर्स्थापित करने या उसकी रक्षा करने का काम करता है, वह नए शहरीकरण के आंदोलन में शामिल हो सकता है।

संदर्भ:
https://thecityfix.com/blog/will-covid-19-affect-urban-planning-rogier-van-den-berg/
https://www.cnu.org/resources/what-new-urbanism
https://www.cnu.org/sites/default/files/sustainable_development_zones_indias_new_urbanism_pories.pdf
https://www.newgeography.com/content/006328-new-urbanism-and-jane-jacobs-a-tangled-disconnect

चित्र सन्दर्भ:
पहली छवि शहरी डिज़ाइन किए गए शहर की तस्वीर दिखाती है।(teri)
दूसरी छवि उच्च गति दिल्ली-मेरठ क्षेत्रीय रैपिड ट्रांजिट सिस्टम को दिखाती है।(trade link media)
तीसरी छवि नए शहरीकरण की ओर, मेरठ शहर में निर्माण को दर्शाती है।(hindustan times)
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