हस्तिनापुर में स्थित जैन मंदिर में पद्मासन मुद्रा में मौजूद है तीर्थंकर शांतिनाथ की प्रतिमा

मेरठ

 14-09-2020 04:47 AM
विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

वर्तमान युग (अवसारपनि) के जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर (जैन धर्म में तीर्थंकर, जिन्हें 'जीना' भी कहा जाता है, एक ऐसे उद्धारकर्ता हैं, जिनके द्वारा जीवन और पुनर्जन्म की धारणा को सफलतापूर्वक पार किया गया है और उन्होंने दूसरों के अनुसरण के लिए एक रास्ता बनाया है) शांतिनाथ का जन्म ज्येष्ठ कृष्ण महीने के 13वें दिन में राजा विश्वसेन और रानी अचिरा से इक्ष्वाकु वंश, हस्तिनापुर में हुआ था। 25 वर्ष की आयु में ही उन्होंने सिंहासन संभाल लिया था और लगभग 25,000 से अधिक वर्षों तक सिंहासन संभालने के बाद वे एक जैन साधु बन गए और तपस्या करनी शुरू कर दी। इन्हें चक्रवर्ती और कामदेव के रूप में भी देखा जाता है।
जैन मान्यताओं के अनुसार, अपने सभी कर्मों को नष्ट करके वे एक सिद्ध, एक स्वतंत्र आत्मा बन गए। ऐसा कहा जाता है कि वे एक लाख वर्ष तक जीवित रहे और उन्होंने कई वर्ष अपने ज्ञान को फैलाने में बिताया। ज्येष्ठ (मई-जून) के अंधेरे छमाही के 13वें दिन, उन्होंने सम्मेद शिखरजी ( जिसे उत्तरी झारखंड में पारसनाथ पहाड़ियों के रूप में जाना जाता है) में निर्वाण प्राप्त किया। शांतिनाथ के यक्ष और यक्षी दिगंबर परंपरा के अनुसार किमपुरुष और महामानसी हैं और श्वेतांबर परंपरा के अनुसार गरुड़ और निर्वाण हैं। उत्तर प्रदेश के हस्तिनापुर में स्थित श्री दिगंबर जैन प्राचीन बड़ा मंदिर तीर्थंकर शांतिनाथ को समर्पित है। यह हस्तिनापुर का सबसे पुराना जैन मंदिर है।
इस मंदिर का निर्माण सन 1801 में राजा हरसुख राय के द्वारा करवाया गया था, जो कि मुग़ल बादशाह शाह आलम द्वितीय के शाही कोषाध्यक्ष थे। यहाँ पर कई मंदिर स्थापित हैं और उन कई मंदिरों में से जो मुख्य मंदिर है उसके आराध्य तीर्थंकर शांतिनाथ हैं। इनकी पद्मासन मुद्रा की प्रतिमा इस मंदिर में विराजित है। शांतिनाथ को आमतौर पर उनके नीचे एक हिरण या मृग के प्रतीक के साथ बैठे या खड़ी ध्यान मुद्रा में दर्शाया जाता है। हर तीर्थंकर में एक विशिष्ट प्रतीक है जो उपासकों को तीर्थंकरों की समान दिखने वाली मूर्तियों में भेद करने में मदद करती है। शांतिनाथ के मृग प्रतीक को आमतौर पर तीर्थंकर के पैरों के नीचे चित्रित किया जाता है। सभी तीर्थंकरों की तरह, शांतिनाथ को श्रीवत्स और झुकी आँखों में दर्शाया गया है। वहीं ऐसा माना जाता है कि जैन धर्म के 21 तीर्थंकरों द्वारा कायोत्सर्ग की खड़ी मुद्रा में मोक्ष प्राप्त किया गया था। जैन धर्म में कायोत्सर्ग एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण मुद्रा है, जिसे योगिक मुद्रा के रूप में जाना जाता है। यह मुद्रा ध्यान का एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है। कायोत्सर्ग का शाब्दिक अर्थ है 'काया को त्यागना' जहाँ काया से तात्पर्य है 'शरीर'। कायोत्सर्ग खड़े और बैठे दोनों ही प्रकार से हो सकता है।
कायोत्सर्ग में स्थिर रहना एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षण है और शारीरिक आराम की गतिविधियों का परित्याग करना इसका लक्ष्य होता है। इस काया या मुद्रा का संकेत है आत्मा के वास्तविक स्वरुप से भेंट करना। कायोत्सर्ग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण, बाहुबली की प्रतिमा जो कि श्रवणबेलगोला में स्थित है। साथ ही जैन धर्म में तीर्थंकर की छवियों की व्यक्तिगत देवताओं के रूप में पूजा नहीं की जाती है। इसके बजाय, जैन विश्वासियों द्वारा इन्हें एक महान व्यक्तियों के प्रतिनिधियों के रूप में श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।

संदर्भ :-
https://en.wikipedia.org/wiki/Digamber_Jain_Mandir_Hastinapur
https://en.wikipedia.org/wiki/Shantinatha
https://en.wikipedia.org/wiki/Kayotsarga
https://www.britannica.com/topic/kayotsarga
चित्र सन्दर्भ:
मुख्य चित्र में लोध्रुवा (Lodhruva), राजस्थान स्थित 16वें जैन तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ की पद्मासन प्रतिमा को दिखाया गया है। (Wikipedia)
दूसरे चित्र में हस्तिनापुर में स्थित जैन मंदिर में स्थापित भगवान महावीर की प्रतिमा को दिखाया गया है। (Prarang)
तीसरे चित्र में हस्तिनापुर के जैन मंदिर परिसर में लोटस मंदिर, सुमेरु पर्वत को दिखाया गया है। (Prarang)
चौथे चित्र में भगवान शांतिनाथ की पद्मासन प्रतिमा (मध्य में) को दिखाया गया है। (Prarang)

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