कैसे हुआ भारत में पाव और पाव-भाजी का आगमन

मेरठ

 19-08-2020 03:10 AM
स्वाद- खाद्य का इतिहास

ऐसे कई व्यंजन हैं, जो विभिन्न स्थानों पर पारंपरिक रूप से निर्मित किये जाते हैं किंतु वास्तव में वे कहीं और से विकसित हुए हैं। प्रत्येक भोजन की अपनी कहानी है, जो सामग्री और व्यंजनों की सीमाओं और परिवर्तन को पार करती है। भारत के लिए भी यह उतना ही सच है जितना कि किसी और देश के लिए। यहाँ, कुछ खाद्य पदार्थ उपनिवेश की अधिक सौम्य विरासतों में से एक है, जिसका महत्वपूर्ण उदाहरण एक नरम पुर्तगाली ब्रेड रोल (Bread Rolls) या पाव है, जो कि भारत के कुछ पसंदीदा स्ट्रीट फूड (Street Food) का प्रिय घटक है। पाव की उत्पत्ति और उसके नाम के पीछे की कहानी एक लोककथा की तरह है। एक संस्करण के अनुसार, इसे पाव कहते हैं क्योंकि इसे चार समूह में प्राप्त करते हैं। पाव का मतलब मराठी भाषा में एक-चौथाई होता है। दूसरे संस्करण में कहा गया है कि इस तरह की ब्रेड अर्थात पाव बनाने की कला पुर्तगाली लोगों द्वारा भारत में लाई गई थी। इससे पहले, भारतीय लोगों ने केवल चपातियों जैसी अखमीरी रोटी बनाई। एक अन्य कहानी के अनुसार ब्रेड को पाव कहा जाता है क्योंकि काम को गति देने के लिए पैरों का उपयोग करके आटा गूंदा गया। 1498 में, पुर्तगाली खोजकर्ता वास्को डी गामा (Vasco da Gama) भारत के पश्चिमी तट पर उतरे। उनके आगमन ने भारत के तटों पर पुर्तगाली उपनिवेश की शुरुआत का संकेत दिया, जो 1961 तक चला। शुरुआती व्यापारियों ने अमेरिका से आलू, टमाटर और मिर्च जैसी खाद्य सामग्रियों का आयात किया। जब पुर्तगाली आये तो उन्हें अपने धार्मिक अनुष्ठान के लिए ब्रेड की कमी महसूस हुई। भारत में पर्याप्त गेहूं का आटा तो था, लेकिन ब्रेड यीस्ट (Yeast) का स्रोत मुश्किल था। इसलिए उन्होंने आटा गूंथने के लिए ताड़ के रस वाली शराब का सहारा लिया और इस प्रकार पाव का जन्म हुआ।
माना जाता है कि इस ब्रेड से बनने वाली पाव भाजी की उत्पत्ति 1860 के दशक में अमेरिका के गृह युद्ध में हुई। गृह युद्ध की वजह से कपास की भारी मांग थी। इसके कारण, बॉम्बे कॉटन एक्सचेंज (Bombay Cotton Exchange) में व्यापारी विशेष रूप से रात के दौरान बहुत व्यस्त रहते थे, जब नए कपास की दरें अमेरिका से टेलीग्राम (Telegram) हुआ करती थीं। इस प्रकार वे देर से घर लौटते थे और नाराज पत्नियां उन्हें भोजन नहीं देती थीं। इस समस्या को हल करने के लिए सड़क विक्रेताओं ने ईसाईयों के पवित्र अनुष्ठान में बची हुई ब्रेड को इकट्ठा करना शुरू किया और सभी सब्जियों को एक साथ मिलाकर मैश (Mash) कर उन्हें ब्रेड और मक्खन के साथ खाया। इस प्रकार पाव (रोटी) भाजी (सब्जियों) का जन्म हुआ। इस विनम्र शुरुआत के बाद पूरे राष्ट्र में एक घरेलू खाद्य पदार्थ के साथ-साथ पाव भाजी ने मुंबई की सड़कों पर एक लंबा सफर तय किया जिसे गर्म, मसालेदार, लजीज भाजी, कुरकुरे प्याज और नींबू के टुकड़े के साथ परोसा गया। स्वतंत्रता के कई वर्षों बाद, कई गोवावासी काम की तलाश में मुंबई चले गए और पारंपरिक ईरानी बेकरी (Bakery) और कैफे (Cafe) में परोसे गए व्यंजनों में पाव को अपनाते हुए कार्यबल में शामिल हुए। पाव को मांस, करी, सब्ज़ी और तले हुए आलू के साथ परोसा गया। ईरानी कैफे में खीमा पाव भी परोसा गया। खीमा कीमा बनाया हुआ मांस होता है, जो टमाटर, मिर्च, अदरक, लहसुन और मसालों के साथ मिला होता है। मांस का वसा, पाव भाजी में मक्खन के समान समृद्धि प्रदान करता है। पाव के साथ वड़ा पाव का भी विकास हुआ। वड़ा पाव मैश किए हुए मसालेदार आलू से बनाया जाता है, जिसे बेसन के बैटर (Batter) में डूबाकर फिर तला जाता है। इसे तब एक पाव के अंदर रखा जाता है, जिसमें मसालेदार चटनी होती है।
वड़ा पाव का आविष्कार 1960 के दशक में अशोक वैद्य नामक एक स्ट्रीट वेंडर (Street Vendor) द्वारा किया गया था, जो मुंबई में दादर ट्रेन स्टेशन के बाहर काम करता था। यह समझकर कि व्यस्त यात्रियों को भोजन के लिए रुकने का समय नहीं है, वह एक ऐसा स्नैक (Snack) लेकर आए, जिसे चलते-फिरते खाया जा सकता था। वड़ा पाव अब मुंबई में सबसे लोकप्रिय स्ट्रीट फूड में से एक है। इसी प्रकार पाव से भुर्जी पाव और डबेली (Dabeli) भी बनाया गया, जो भुर्जी, प्याज, टमाटर और मसालों के साथ तैयार किए गए अंडों का भारत का संस्करण है। भारत के विभिन्न हिस्सों में इस लोकप्रिय स्ट्रीट फूड में अनेक स्वाद और बदलाव जुडे। देश के विभिन्न हिस्से के आधार पर पाव भाजी के अलग-अलग प्रकार हैं, जैसे - जैन पाव भाजी, काठियावाड़, कड़ा पाव आदि। जैन पाव भाजी में कोई प्याज और लहसुन नहीं डाला जाता। इसमें आलू और मसले हुए मटर के बजाय कच्चे केले का उपयोग किया जाता है। यह गुजरात और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में उपलब्ध है। काठियावाड़ गुजरात का एक क्षेत्र है, जिसका अपना विशेष व्यंजन है। इस क्षेत्र के पाव भाजी में स्थानीय मसाले होते हैं, जो इसे एक अलग स्वाद देते हैं। इसे एक गिलास छाछ के साथ परोसा जाता है। कड़ा पाव भाजी नियमित पाव भाजी की तरह ही होती है, लेकिन इसमें सब्ज़ी को मैश नहीं किया जाता अर्थात कटी हुई और पकी हुई सब्ज़ियों को बरकरार रखा जाता है। पाव भाजी के पंजाबी संस्करण में अतिरिक्त गरम मसाले, अतिरिक्त मक्खन आदि डाले जाते हैं, जिसे लस्सी के गिलास के साथ परोसा जाता है। इस प्रकार पाव भाजी के अनेक संस्करण विभिन्न क्षेत्रों में देखने को मिलते हैं।

संदर्भ:
http://virsanghvi.com/Article-Details.aspx?key=1134
https://matadornetwork.com/read/mumbai-street-food-portuguese-bread/
https://medium.com/@hitendrabavadiya/who-invented-the-famous-indian-dish-called-pavbhaji-f6ae40c6d4c7

चित्र सन्दर्भ :
मुख्य चित्र में पाव भाजी को चित्रित किया गया है। (Flickr)
दूसरे चित्र में पाव भाजी बनाते हुए ढेले का चित्रण है। (Wikimedia)
तीसरे चित्र में एक प्लेट में पाव भाजी को दिखाया गया है। (Wikimedia)



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