मनोरंजन साहित्य में रूचि रखने वालों का गढ़ रहा है, मेरठ

मेरठ

 27-04-2020 02:55 PM
ध्वनि 2- भाषायें

पुराने हास्य कहानियों और सस्ते उपन्यासों को इकट्ठा करना विश्व के पसंदीदा शगल में से एक है। यहां तक कि इंटरनेट के युग में, दुर्लभ हास्य कहानियों और सस्ते उपन्यासों का मूल्य काफी बढ़ गया है। स्मार्ट व्यवसाय में अवसर पाकर पुरुषों द्वारा 1950 से 1970 के दशक में हिन्दी के सस्ते उपन्यास का केंद्र इलाहाबाद से मेरठ में स्थानांतरित कर दिया गया था। इसके साथ ही, मेरठ भारत में हास्य कहानियों और सस्ते उपन्यासों को छापने का सबसे बड़ा केंद्र बन गया। वहीं दुर्लभ हास्य कहानी और सस्ते उपन्यास का संग्रह करने वालों के लिए मेरठ एक उचित स्थान साबित हो सकता है। हालांकि मेरठ में बड़ी विशेषज्ञ दुकानें तो मौजूद नहीं हैं, लेकिन यहाँ मौजूद छोटे पुस्तकालय, दुकान और प्रिंटर (printer) गोदाम इन पर रुचि रखने वालों के लिए एक बड़ा खजाना साबित हो सकता है। वहीं जो लोग इस क्षेत्र में नए हैं, उन्हें पहले भारत के हास्य कहानियों और सस्ते उपन्यासों दोनों के मुद्रण इतिहास से परिचित होना चाहिए।

आइए इसे भारत के हास्य पुस्तकों के विकास के एक निर्णायक इतिहास और समयरेखा को समझते हुए जानते हैं। दशकों से हमारे बीच मौजूद रही भारतीय हास्य पुस्तकों और चित्रात्मक कहानियों का एक सदी का दस्तावेजीकरण शामिल हैं।
1. 1950 से पूर्व में :-

इस युग में “बालक और होनहार” जैसी बच्चों के लिए उत्कृष्ट हिंदी और उर्दू हास्य पत्रिकाएं प्रकाशित होनी शुरू हुईं थी, जिसमें बालक 1926 – 1986 तक काफी प्रचलित रही थी। वहीं दूसरी ओर चंदामामा, जिसे हालांकि 1947 में बच्चों की मासिक पत्रिका से हटा दिया गया था, लेकिन ये आज भी कई अवतारों में मौजूद हैं।
2. 1940 - 1950 के दशक के अंत में :-
संघ द्वारा प्रकाशन और अनुवाद ने भारतीय दर्शकों के लिए अंतरराष्ट्रीय हास्य कहानियों को उपलब्ध करवाया गया था। द फैंटम, मैंड्रेक, फ्लैश गॉर्डन, रिप किर्बी और बहुत सारी कहानियाँ कुछ भारतीय दर्शकों के लिए अनुवादित की गई थी।
3. 1960 के दशक और इसके बाद में :-
इस दशक में हास्य पुस्तकें मुख्यधारा के दायरे में प्रवेश कर चुकी थी। हास्य पुस्तक की अवधि में भारत के एक परम अग्रदूत अनंत पई (जो अंकल पई के नाम से लोकप्रिय थे) द्वारा संपादित “इंद्रजाल” नामक एक हास्य कहानी का आगमन हुआ था। अमर चित्र कथा (1967) और टिंकल के निर्माता के रूप में, उनके हास्य कहानियों के सफर में आगमन से ही भारतीय हास्य कहानियों में काफी बदलाव आ गया था। इंद्रजाल हास्य कहानियों के शुरुआती प्रकाशन में पहली बार स्वदेशी भारतीय प्रतिभा को दिखाया गया था और कई पहली पीढ़ी के भारतीय कलाकारों ने इसका चित्रण किया था। वहीं इस दशक में भारत की विश्व प्रसिद्ध और सर्वोच्च प्रभावशाली एमएडी (MAD) पत्रिका “दीवाना पत्रिका” का चित्रण अनुकरण भी स्थापित किया गया था।

वहीं 1969 में भारत के सबसे लोकप्रिय हास्य चरित्रों में से एक, चाचा चौधरी की अवधारणा सामने आई थी। एक कमजोर, मध्यम वर्ग, बूढ़े व्यक्ति के लिए, प्राण कुमार शर्मा की रचना चाचा चौधरी एक पूरे देश की कल्पनाओं को पकड़ने में कामयाब रही थी। वहीं 1970 के दशक से हास्य कहानियों के मंच में प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगी, अमर चित्र कथा, इंद्रजाल जैसी हास्य पत्रिकाओं के चलने के बाद कई स्थानिक प्रकाशक उभरने लगे। कुछ विशेष रूप से सफल लोगों में मेरठ और दिल्ली के गोयल कॉमिक्स, मनोज कॉमिक्स और अन्य सस्ते उपन्यास के प्रकाशक शामिल थे, जबकि कई अपने विशिष्ट भारतीय हास्यचित्र पात्र को पर्याय बनाकर अपने पृष्ठों में छापने लग गए थे।
इसका एक अच्छा उदाहरण डायमंड हास्य कहानियाँ (1978 में स्थापित) हैं, जो फौलादी सिंह के लिए जानी जाती हैं। वहीं राज कॉमिक्स द्वारा प्रस्तुत की गई नागराज और बुगाकू के प्रकाशित होने के तीन महीने के भीतर 6 लाख से अधिक प्रतियां बिकीं थी, जिसके बाद वह अब तक का सबसे अधिक बिकने वाला भारतीय कॉमिक बन गया था। भारत के प्रमुख कॉमिक बुक हाउसों में से एक, मनोज कॉमिक्स ने भी 90 के दशक में एक साल के भीतर 365 से अधिक हास्य कहानियाँ प्रकाशित किए थे।

4. 2000 के दशक में :-
2000 के दशक में नई तकनीक द्वारा एक नया युग सामने आया। इस युग तक केवल राज कॉमिक्स और डायमंड कॉमिक्स ही बने रहे। फिर भी, जैसे-जैसे परिदृश्य बदला, नए अवसर उत्पन्न हुए। उनमें से कुछ में शामिल हैं: सैन जोस, कैलिफोर्निया स्थित स्लेव लेबर ग्राफिक्स (2002); ग्रांट मॉरिसन द्वारा विमनाराम कॉमिक जारी की गई, जबकि मार्वल ने स्पाइडर मैन: इंडिया प्रोजेक्ट (2004-2005) प्रारंभ किया और फिर कैम्प फायर ग्राफिक उपन्यास (2008) सामने आया था। ऐसे ही वर्तमान समय में कई नए युग की हास्य कहानियाँ हमारे समक्ष प्रस्तुत है।

वहीं बढ़ते इंटरनेट (internet) के दौर में इन हास्य कहानियों का प्रकाशन होना लगभग बंद सा हो गया है, लेकिन हास्य कहानियों के प्रेमियों द्वारा आज भी पुरानी हास्य किताबों की खोज जारी है। वहीं कई विक्रेताओं द्वारा आधुनिक तकनीक, जैसे व्हाट्सएप (Whatsapp) का उपयोग करते हुए हास्य कहानियों के प्रेमियों का एक समूह बनाया जाता है। जिसमें सदस्य नियमित रूप से लोकप्रिय भारतीय कॉमिक्स के पुराने संस्करणों की तस्वीरें साझा करते हैं और बिक्री मूल्य उद्धृत करते हैं। ज्यादातर मामलों में 24 घंटे की समय सीमा सौदे को बंद करने के लिए निर्धारित करी जाती है। जिसके अंतर्गत इच्छुक खरीदार बोली लगाते हैं या बदले में किसी दुर्लभ संस्करण का विवरण साझा करते हैं। वहीं कई बोलियां कई हजार रुपये तक जा सकती हैं। वहीं दिल्ली के एक पुस्तविक्रेता ने एक बार एक पुराने इंद्रजाल की पुस्तक को एक व्यक्ति को 1 लाख रुपये में बेच दिया था। जबकि उसी पुस्तक को अमेरिका के एक संग्राहक ने बाद में 4 लाख रुपये में खरीदा था। साथ ही पुस्तविक्रेता द्वारा अमर चित्र कथा के पहले 10 प्रकाशन में से प्रत्येक का मूल्य 30,000-35,000 रुपये था।

सौ साल पहले शुरू हुआ मेरठ का प्रकाशन उद्योग अब मुख्य रूप से शैक्षिक पुस्तकों के प्रकाशन पर केंद्रित हो गया है। मेरठ कॉलेज (College) के एमए अर्थशास्त्र के छात्र राजेंद्र अग्रवाल की पहल से मेरठ के प्रकाशन उद्योग की प्रकृति में बदलाव आया। इस समय कचहरी रोड पर चित्रा प्रकाशन, नागिन प्रकाशन, प्रगति प्रकाशन, जीआर बाथला एंड संस, भारत भारती प्रकाशन, आदि ने मेरठ के प्रमुख प्रकाशनों के कार्यालय बनाए हैं। पूरे देश में शायद ही कोई ऐसी दुकान होगी, जहां मेरठ से प्रकाशित किताबें न हों। मेरठ ने केवल शैक्षिक प्रकाशन में ही नहीं अपितु हिंदी काल्पनिक उपन्यासों में भी अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाया तथा पूरे देश में हिंदी पल्प फिक्शन (Hindi Pulp Fiction) के लिये अधिकेंद्र के रूप में उभरा। रोमांस (Romance), रोमांच और रहस्य से भरपूर उपन्यासों के प्रिंट ऑर्डर (Print Order) लाखों में लिये जा रहे हैं, जो कि एक इतिहास कायम कर रहा है। इसने उत्तर भारत के पाठकों का ध्यान वापस किताबों में केंद्रित कर हिंदी प्रकाशन उद्योग को पुनर्जीवित किया है।

चित्र (सन्दर्भ):
1.
प्रथम चित्र में हिंदी के लुगदी उपन्यास (Pulp Fiction Novels) के संग्रह का एक चित्र है।, Prarang
2. दूसरे चित्र में एक पुस्तक विक्रेता की दूकान पर रखे नए और पुराने लुगदी उपन्यास के संग्रह को दिखाया गया है।, Wikimedia
संदर्भ :-
1. https://homegrown.co.in/article/21898/a-complete-timeline-the-evolution-of-comic-books-in-india-1926-present
2. https://bit.ly/2KE8tqs
3. https://bit.ly/2SdDIgh
4. https://bit.ly/2yOH6ak
5. http://www.allaboutbookpublishing.com/1675/a-glimpse-of-the-meerut-publishing-industry/
6. https://bit.ly/3bJyEI7

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