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मेरठ के नज़दीक स्थित जैन मंदिर में पाए जाते हैं, इस अनोखी मुद्रा में है श्री शांतिनाथ की प्रतिमा

मेरठ

 14-03-2020 10:00 AM
विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

प्राचीन भारत का 6ठी शताब्दी ईसा पूर्व का इतिहास अत्यंत ही महत्वपूर्ण रहा है। यह वह दौर था जब भारत ने पूरे विश्व को दो अत्यंत ही महत्वपूर्ण धर्मों से नवाज़ा था और ये धर्म थे ‘जैन’ तथा ‘बौद्ध’। जैन धर्म के महावीर स्वामी और बौद्ध के गौतम बुद्ध ने पूरे देश भर में ज्ञान की अलौकिक अलख जगा दी थी। जैन धर्म की बात करें तो यह अहिंसा जैसे विभिन्न मार्गों की बात करता है जो कि मनुष्य जीवन को दुःख से दूर करने का कार्य करते हैं। महावीर स्वामी ने सम्पूर्ण भारत में घूमकर जैन धर्म का प्रचार प्रसार किया और कालांतर में इसका ही परिणाम था कि चन्द्रगुप्त मौर्य जो कि मौर्य वंश के संस्थापक थे और एक अत्यंत ही प्रतापी शासक थे, ने भद्रबाहु से दीक्षा लेकर जैन धर्म को अपना लिया था।

तीसरी शताब्दी ईसापूर्व से ही जैन धर्म एक बड़े स्तर पर फैलना शुरू हो गया था। आठवीं-नौवीं शताब्दी आने के बाद जैन धर्म पूरे भारत भर में फ़ैल चुका था। चाहे हम बात करें परमार राजाओं की या प्रतिहार या फिर चंदेल इन सभी राजवंशों ने जैन धर्म के प्रसार के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसी योगदान का फल है कि आज पालिताना, खजुराहो, उन, ललितपुर आदि स्थान जैन धर्म के केंद्र के रूप में देखे जाते हैं। दक्षिण भारत में भी जैन धर्म का प्रसार बड़े पैमाने पर हुआ था और इसी का परिणाम है बाहुबली की विशालकाय प्रतिमा। इस लेख में हम मेरठ के करीब हस्तिनापुर में बने दिगंबर जैन मंदिर में स्थित ‘कायोत्सर्ग मुद्रा’ में बने शांतिनाथ की प्रतिमा के विषय में अध्ययन करेंगे तथा कायोत्सर्ग मुद्रा के महत्व और अर्थ के विषय में जानने की कोशिश करेंगे। हस्तिनापुर का श्री दिगंबर जैन मंदिर हस्तिनापुर का सबसे प्राचीन जैन मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण सन 1801 में राजा हरसुख राय के द्वारा करवाया गया था, जो कि मुग़ल बादशाह शाह आलम द्वितीय के शाही कोषाध्यक्ष थे। यहाँ पर कई मंदिर स्थापित हैं और उन कई मंदिरों में से जो मुख्य मंदिर है उसके आराध्य देव शांतिनाथ हैं जिनकी पद्मासन मुद्रा की प्रतिमा इस मंदिर में विराजित है।

जैन धर्म में कायोत्सर्ग एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण मुद्रा है जिसे कि योगिक मुद्रा के रूप में जाना जाता है। यह मुद्रा ध्यान का एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है। कायोत्सर्ग का शाब्दिक अर्थ है काया को त्यागना जहाँ काया से तात्पर्य है शरीर। कायोत्सर्ग खड़े और बैठे दोनों ही प्रकार से हो सकता है। कायोत्सर्ग में स्थिर रहना एक अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु है और शारीरिक आराम की गतिविधियों का परित्याग करना इसका लक्ष्य होता है। इस काया या मुद्रा का बिंदु है आत्मा के वास्तविक स्वरुप से भेंट करना। कायोत्सर्ग की प्रतिमा के विषय में यदि बात करें तो बाहुबली की प्रतिमा जो कि श्रवणबेलगोला में स्थित है, एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह कहा जाता है कि कायोत्सर्ग की मुद्रा का पालन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। शांतिनाथ जो कि जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर थे, का जन्म इक्ष्वाकु वंश के राजा विश्वसेन और रानी अचिरा से हस्तिनापुर में हुआ था। उनको चक्रवर्ती के रूप में भी देखा जाता है। इसी कारण से हस्तिनापुर का दिगंबर जैन मंदिर और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

सन्दर्भ:
1.
https://en.wikipedia.org/wiki/Digamber_Jain_Mandir_Hastinapur
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Shantinatha
3. https://en.wikipedia.org/wiki/Kayotsarga
4. https://www.britannica.com/topic/kayotsarga
चित्र सन्दर्भ:
1.
https://en.wikipedia.org/wiki/Shantinatha
2. https://bit.ly/2W94ZTH



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