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कुप्रथाओं को छोड़ प्यार और सद्भाव का पाठ सिखाता होली का त्यौहार

मेरठ

 10-03-2020 07:57 AM
विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

लट्ठमार होली:
भारत एक ऐसा देश है, जहाँ स्त्रीयों को पुरुषों कि तुलना में कम महत्व दिया जाता था किन्तु प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति सही मायनों में स्त्री ओर पुरुषों के मध्य कोई अंतर नही करती है। भारत में इस कुप्रथा का आज से नही अपितु कई वर्षों से निष्पादन किया जा चुका है, वो भी साँस्कृतिक तौर पर हमारी सभ्यता के साथ रच वश कर, फिर चाहे वो देवी दुर्गा के रूप में स्त्री शक्ति का प्रतीक हो या सरस्वती के रूप में निर्मल ज्ञान का स्त्रोत हो। भारत में और भी कई उत्सव हैं, जो स्त्री महत्व और स्त्री को सम्मानीय दर्जा देते हैं। इन्हीं प्रथाओं में से एक है, उतर भारत में खेली जाने वाली 'लट्ठमार होली'। इस दिन उत्तर भारत और खासकर 'बरसाना’ शहर मस्ती, प्यार और समानता के बड़े प्रदर्शन मंच में तब्दील हो जाता है, पूरी दोपहर महिलाएं शहर में घूमती हैं, जो पुरुषों को विशाल बांस की लकड़ियों से मारती हैं। इस परंपरा का संदर्भिक अर्थ पुरुषों और महिलाओं में सामाजिक समानता की भावना को निहित करना माना जाता है।


विधवाओं की होली:

दशकों तक सफेद साड़ियों में लिपटी और मुख्यधारा के समाज से दूर रहने वाली विधवाओं का जीवन बहुत कठिन हो जाता था। अपने परिवारों द्वारा परित्यक्त, वे गुमनामी और अपमान की जिंदगी जीने के लिए मजबूर हो जाती थीं। घोर गरीबी में रहने वाली, इन महिलाओं को सामाजिक कलंक के रूप में संदर्भित करके परेशान किया जाता था, क्योंकि उनकी छाया को भी एक अपशगुन माना जाता था। हिंदू धर्म पतियों की मृत्यु के बाद महिलाओं को सांसारिक सुखों का त्याग करने की मांग करता था। इस क्रम में 400 साल से हिंदू विधवाओं के लिए रंगों के त्याग के साथ होली मनाना नामुमकिन था। लेकिन वृंदावन में पिछले कुछ वर्षों से यह कुप्रथा ख़त्म कर दी गयी है और अब वृन्दावन में सभी विधवा महिलाएं पुष्पों की होली में शामिल होकर इस त्यौहार का आत्मिक आनद प्राप्त करती हैं। वृन्दावनवासियों के इस कदम के साथ ही भारत के अन्य स्थानों पर भी इस कुप्रथा को खत्म किया जाने लगा है। यह एक अविश्वसनीय भावनात्मक अनुभव है, जो हमारे देश में निहित कुछ समस्याओं के प्रति देशवासियों की सजगता का अनुभव कराता है। इस परंपरा को ख़त्म करने में एक बड़ा हाथ सुलभ इंटरनेशनल (Sulabh International) नामक गैरसरकारी संगठन (NGO) का रहा है। 1970 में डॉ. बिंदेश्वर पाठक द्वारा स्थापित, सुलभ इंटरनेशनल स्वच्छता के क्षेत्र में योगदान, स्वच्छता के लिए मानवाधिकारों के अपने आवेदन के पैमाने में ऐतिहासिक कदम है साथ ही साथ स्त्री सशक्तिकरण तथा विधवाओं की सामाजिक स्थिति और सम्मान के लिए भी आगे आया है। आज प्रारंग लेकर आया है एक ऐसा चलचित्र जो स्त्री सशाक्तिकरण के रूप में होली के त्यौहार का महत्व प्रस्तुत कर रहा है। इस चलचित्र का नामांकन लोगों की होली (The People’s Holi) रखा गया है, इस चलचित्र को प्रस्तुत किया है टॉम वाटकिंस (Tom Watkins) ने।

सन्दर्भ:
1. https://www.sulabhinternational.org/founders-profile-dr-bindeshwar-pathak/
2. https://vimeo.com/258575026



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