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एचआईवी के उपचार में बाधक है एचआईवी स्टिग्मा (HIV Stigma)

मेरठ

 02-12-2019 12:48 PM
विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

शारीरिक समस्या संसार में रह रहे किसी भी व्यक्ति को हो सकती है। किंतु यदि आपकी और आपके आस-पास रह रहे समाज की सोच आपकी बीमारी के प्रति सकारात्मक है तो आप उस बीमारी का सामना बहुत आसानी से कर सकते हैं किंतु यदि सोच और हमारी जानकारी नकारात्मक है तो उस बीमारी का सामना करना और भी कठिन हो जाता है। इस अवस्था में बीमारी से ग्रसित व्यक्ति अपना ईलाज करवाने से भी मना कर देते हैं। एड्स (AIDS) भी इसी तरह की एक शारीरिक बीमारी है जिसे लेकर समाज में विभिन्न प्रकार के मिथक आज भी बने हुए हैं। ये मिथक एड्स से ग्रसित व्यक्ति के जीवन को नकारात्मक दिशा प्रदान करते हैं।

एड्स के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण और विश्वास को एचआईवी स्टिग्मा (HIV Stigma) का नाम दिया गया है। यह नाम मुख्य रूप से इसलिए दिया गया है क्योंकि आज भी समाज में एड्स के प्रति जागरूकता का अभाव है। यह अभाव गलत धारणा उत्पन्न करके नकारात्मक दृष्टिकोण और विश्वास को बढावा देता है। यह विश्वास एड्स से ग्रसित व्यक्ति को एक ऐसे समूह का हिस्सा बनाता है जिसे समाज के लिए अस्वीकार्य माना जाता है। एड्स के सम्बंध में सबसे बडा मिथक यह है कि केवल कुछ लोगों के समूह को ही एचआईवी हो सकता है। इस तरह का गलत दृष्टिकोण भेदभाव को जन्म देता है। भेदभाव समाज का वह दुर्व्यवहार है जो नकारात्मक दृष्टिकोणों या विश्वासों के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है।

भेदभाव को निम्नप्रकार से समझा जा सकता है:
• स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों द्वारा एचआईवी से ग्रसित व्यक्ति को देखभाल या सेवा उपलब्ध कराने से इनकार करना। एचआईवी से ग्रसित व्यक्ति के साथ आकस्मिक संपर्क से इनकार करना।
• किसी समुदाय के सदस्य को सामाजिक रूप से अलग करना क्योंकि वो एचआईवी पॉजिटिव (HIV positive) है इत्यादि।

इस प्रकार के भेदभाव एचआईवी स्टिग्मा के ही परिणाम हैं जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव पीडित व्यक्ति के जीवन में देखा जा सकता है। इससे रोगी व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित होने लगता है तथा उनमें एक नकारात्मक आत्म-छवि विकसित होने लगती है जो उनके अंदर डर पैदा करती है। उन्हें यह डर लगने लगता है कि यदि उनकी एचआईवी स्थिति का किसी को पता चला तो उनके साथ भेदभाव किया जाएगा। इस प्रकार पीडित व्यक्ति में शर्म, डर, अलगाव, और निराशा आदि के भाव उत्पन्न होने लगते हैं। ये भावनाएं लोगों को एचआईवी के लिए परीक्षण और उपचार करने से रोक सकती हैं। इस प्रकार पनपी हीन भावना के कारण रोगग्रस्त व्यक्ति अपना ईलाज करवाने के लिए भी मना कर देते हैं।

एचआईवी स्टिग्मा एचआईवी के भय को और भी गहरा कर देता है। इसके निवारण का सबसे प्रभावी उपाय इसके प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को अपनाना और इसके बारे में बात करना है। यह आवश्यक है कि सबको एचआईवी की सही जानकारी हो। इसके संदर्भ में खुलकर बात की जानी चाहिए। खुलकर बात करने से विषय को सामान्य बनाने में मदद मिल सकती है। यह गलत धारणाओं को सही करने और दूसरों को एचआईवी के बारे में अधिक जानकारी देने में मदद करने के लिए अवसर प्रदान करता है। सबसे पहले एचआईवी के प्रति स्वयं की धारणाओं को सही करना आवश्यक है। हम केवल रोजमर्रा के जीवन में उन शब्दों और कार्यों को अपनाएं जो एचआईवी स्टिग्मा को समाप्त करने में मदद करे। अपने सहायक व्यवहार से दूसरों का नेतृत्व करें।

UNAIDS ने सभी देशों के लिए परीक्षण और उपचार को बढ़ाने के लिए एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है ताकि 2020 तक एचआईवी से ग्रसित व्यक्ति की स्थिति का पता चल सके तथा 90% लोगों को एंटीरेट्रोवाइरल (antiretroviral) उपचार दिया जा सके। किंतु भारत में एचआईवी स्टिग्मा इस लक्ष्य की प्राप्ति में बाधक है। एचआईवी का सामना करने के लिए सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि आखिर एचआईवी होने के क्या कारण हो सकते हैं?
एचआईवी प्रायः शारीरिक द्रव्यों के माध्यम से एक व्यक्ति से दूसरे में जाता है। शारीरिक द्रव्यों मुख्य रूप से असुरक्षित यौन संबंध, मां से बच्चे में गर्भावस्था, प्रसव या स्तनपान के दौरान, संक्रमित इंजेक्शन से दवा लेने, संक्रमित रक्त दान या अंग प्रत्यारोपण के माध्यम से संचरित होता है।

किंतु एचआईवी के संक्रमण के संदर्भ में समाज में कुछ मिथक फैले हुए हैं जो निम्नप्रकार से हैं:
• एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को छूने से एड्स होता है।
• एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को चूमने से एड्स होता है।
• एचआईवी संक्रमित व्यक्ति के पसीने, आंसू इत्यादि के सम्पर्क में आने से एड्स होता है।
• दूषित हवा से एड्स होता है।
• संक्रमित व्यक्ति की खांसी, छींक या थूक के सम्पर्क में आने से एड्स होता है।
• संक्रमित पानी से
• कीड़े इत्यादि

कुछ लोग एचआईवी के इलाज के लिए प्राकृतिक तरीके के रूप में, दवाइयों के वैकल्पिक रूपों को चुनना पसंद करते हैं। किंतु यह भी एक मिथक है क्योंकि हर्बल उपचार काम नहीं करते हैं। हर्बल दवाएं लेना खतरनाक हो सकता है क्योंकि वे संक्रमण से आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली की रक्षा नहीं करते। एचआईवी के उपचार के लिए सबसे प्रभावी तरीका एंटीरेट्रोवाइरल (Antiretroviral) है। किसी करीबी डॉक्टर या स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर द्वारा निर्धारित एंटीरेट्रोवाइरल उपचार लिया जा सकता है। यदि किसी को एचआईवी का पता चलता है तो जल्द से जल्द उपचार शुरू करना खुद की देखभाल करने और अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत रखने के लिए पहला कदम उठाना जरूरी है। हालांकि एंटीरेट्रोवायरल उपचार एचआईवी का इलाज नहीं है, लेकिन यह वायरस को नियंत्रण में रखता है। एचआईवी से ग्रसित लोगों के लिए स्वास्थ्यवर्द्धक भोजन भी प्रभावी हो सकता है।

संदर्भ:
1.
https://www.avert.org/professionals/hiv-social-issues/stigma-discrimination
2. https://www.cdc.gov/hiv/basics/hiv-stigma/index.html
3. https://www.thelancet.com/journals/lanhiv/article/PIIS2352-3018(18)30246-7/fulltext
4. https://www.avert.org/hiv-transmission-prevention/myths
5. https://www.avert.org/living-with-hiv/health-wellbeing/taking-care-of-yourself



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