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भारतीय रंगमंच का इतिहास एवं विकास

मेरठ

 03-09-2019 02:00 PM
द्रिश्य 2- अभिनय कला

भारतीय संस्‍कृति विश्‍व की सबसे प्राचीन और समृद्ध संस्‍कृतियों में से एक मानी जाती है, जिसका प्रत्‍येक पक्ष इसकी खूबसूरती को दर्शाता है। भारतीय रंगमंच भारतीय संस्‍कृति का ही हिस्‍सा है, जो एशिया और यूरोप के सबसे प्राचीन रंगमंचों में से एक है। भारत के शास्त्रीय रंगमंच का प्रारंभिक रूप संस्कृत रंगमंच था जो पश्चिम में ग्रीक और रोमन रंगमंचों के विकास के बाद अस्तित्व में आया था।

भारत में रंगमंच में एक समृद्ध परंपरा है जो देश के प्राचीन अनुष्ठानों और मौसमी उत्सवों से निकटता से संबंधित है। भरत मुनि द्वारा लिखित नाट्य शास्‍त्र विश्‍व का सबसे प्राचीन नाट्य ग्रन्‍थ है, जिसमें नाटक के दस वर्गीकरणों का वर्णन किया गया है। भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार प्रारंभ में नाटक देवताओं की असुरों पर विजय जैसे दिव्य प्रसंग में प्रदर्शित किया जाता था। भारत में रंगमंच एक कथा के रूप में प्रारंभ हुआ, जिसमें सस्वरपाठ, गायन और नृत्य रंगमंच के अभिन्न अंग बन गए। भारतीय कथाओं, साहित्‍यों और कला के अन्‍य सभी रूपों को भौतिक रूप में प्रस्‍तुत करने के लिए रंगमंच का निर्माण किया गया।

एक सिद्धांत के अनुसार भारत में सिकंदर महान के हमले के बाद ग्रीक सेना ने भारत में ग्रीक शैली के नाटकों का मंचन किया और भारतियों ने प्रदर्शन कला को आत्‍मसात किया। जबकि कुछ विद्वानों का तर्क है कि पारंपरिक भारतीय रंगमंच ने इसकी शुरूआत की थी। एक मान्यता है कि शास्त्रीय यूनानी रंगमंच ने इसे रूपांतरित करने में सहायता की है। 10वीं और 11वीं सदी में इस्‍लामी दौर शुरू हुआ, जिसने रंगमंचों को पूर्णतः हतोत्‍साहित किया। 15वीं से 19वीं शताब्दी तक बड़ी संख्या में यह पुनः क्षेत्रीय भाषाओं में विकसित किया गया। 17वीं शताब्‍दी में मेरठ में मुक्ताकाश नाट्य संगठन की स्‍थापना की गयी, जिसने तत्‍कालीन समाज की वास्‍तविकताओं को रंगमंच के माध्‍यम से प्रस्‍तुत करने का प्रयास किया। आधुनिक भारतीय रंगमंच ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन औपनिवेशिक शासन के दौरान, 19वीं शताब्दी के मध्य से 20वीं सदी के मध्य तक विकसित हुआ।

इस दौरान की भारतीय नाट्य शैली में पाश्‍चात्‍य शैली का भी सम्मिश्रण देखने को मिला। संस्कृत शास्‍त्रीय और पश्चिमी शास्‍त्रीय नाटकों, विशेषकर शेक्सपियर की रचनाओं के अनुवादित स्‍वरूप दिखाए जाने लगे। अब तक भारतीय भाषाओं में नाटक एक प्रमुख साहित्यिक शैली के रूप में विकसित नहीं हुआ था। इस दौरान रंगमंच का अभूतपूर्व विकास हुआ, इसके साथ ही शहरी मनोरंजन रंगमंच का उदय हुआ। यह औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप बड़े शहरों की बढ़ती आबादी को मनोरंजन प्रदान करने के लिए विकसित हुआ।

नया शहरी रंगमंच लोकप्रिय रूप से पारसी रंगमंच के रूप में जाना जाने लगा है। यह शैली पश्चिमी प्रकृतिवादी नाटक, ओपेरा (Opera) और कई स्थानीय तत्वों का एक रोचक मिश्रण थी। विशाल मंच और रंगीन पृष्ठभूमि पर आधारित तमाशा इसका एक अनिवार्य हिस्सा था। पारंपरिक लोक और जनजातीय रंगमंच के विपरीत पारसी रंगमंच अब आं‍तरिक क्षेत्रों में प्रस्‍तुत किया जाता था, जिसे अब प्रोसेनियम (Proscenium) रंगमंच कहा जाता है।

भारत में रंगमंच के विकास का दूसरा चरण लोक रंगमंच था, जो मौखिक परंपराओं पर आधारित था। भारत के अधिकांश हिस्‍से में आज भी यह रंगमंच जारी है। भारतीय रंगमंच प्रमुखतः दो भागों में विभाजित था पहला धार्मिक और दूसरा लौकिक या धर्मनिरपेक्ष। धार्मिक रंगमंच में धार्मिक कथाओं का प्रदर्शन किया जाता है, जो गायन, सस्‍वर वाचन और नृत्‍य पर आधारित था। लोक रंगमंच में प्रेम और वीरता से लेकर सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं तक आधारित धर्मनिरपेक्ष विषय थे। इसका एकमात्र उद्देश्य जनता को मनोरंजन प्रदान करना था।

शहरी मध्य और कामकाजी वर्गों को लुभाने के लिए तैयार यह रंगमंच मेलोड्रामा (Melodrama), हास्य, प्रेम और सामाजिक आलोचना की प्रस्‍तुती करता है। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कोलकाता, दिल्ली, मुंबई और चेन्नई जैसे नए उभरते बड़े शहरों में विकसित होने के बाद, पेशेवर समूहों द्वारा प्रदर्शन किया जाने वाला यह रंगमंच सिनेमा (Cinema) के उद्भव से पहले बड़े पैमाने पर मनोरंजन का एकमात्र स्रोत था। संगीत, तमाशा और मेलोड्रामा पर ज़ोर देने के साथ, उनकी प्रस्तुतियाँ भारतीय सिनेमा के प्रतिमान बन गयीं। महाराष्ट्र और असम जैसे कुछ राज्यों को छोड़कर, मनोरंजन रंगमंच को धीरे-धीरे लोकप्रिय सिनेमा द्वारा 1970 तक दबा दिया गया।

हालांकि मनोरंजन रंगमंच ने आम जनता को रोमांचित किया, लेकिन आधुनिक भारतीय आबादी के संवेदनशील वर्गों, विशेष रूप से शिक्षित लोगों ने इसकी आलोचना की। इससे साहित्यिक नाटक और शौकिया रंगमंच का मार्ग प्रशस्त हुआ। साहित्यिक नाटक भारत के विभिन्न भागों में महान भारतीय भाषा लेखकों द्वारा लिखे गए। ऐसे नाटककारों में से सबसे प्रसिद्ध रबिन्द्रनाथ टैगोर थे, जिन्होंने नाटक की शैली को उतना ही समृद्ध किया जितना उन्होंने कविता और उपन्यास को समृद्ध किया था।

संदर्भ:
1.
https://en.wikipedia.org/wiki/Theatre_of_India
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Indian_classical_drama
3. https://study.com/academy/lesson/indian-theatre-origins-types-characteristics.html
4. https://www.indianmediastudies.com/indian-theatre/
5. https://www.indiamart.com/muktakash/profile.html
6. https://bit.ly/2LgffTe
चित्र सन्दर्भ:-
1.
https://live.staticflickr.com/8470/8085588123_e10c3a8544_k.jpg



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