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जापान की संस्कृति में भारतीय धर्म का प्रभाव

मेरठ

 01-06-2019 10:39 AM
विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

भारत और जापान के रिश्ते पारंपरिक रूप से मज़बूत रहे हैं। दोनों देश के लोगों ने आपस में सांस्कृतिक परंपरा साझा की है जिसमें बौद्ध धर्म की विरासत, जनतांत्रिक मूल्यों और नये समाज का विचार शामिल है। दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक विनिमय 6ठी शताब्दी से प्रारंभ हुआ जब भारतीय भिक्षु बौद्ध धर्म की विचारधारा फ़ैलाने जापान पहुंचे। बौद्ध धर्म और आंतरिक रूप से जुड़ी भारतीय संस्कृति का जापानी संस्कृति पर काफी प्रभाव पड़ा और दोनों देशों के बीच परिणामस्वरूप एक प्राकृतिक संवेदना का निर्माण हुआ जिसे आज भी महसूस किया जा सकता है।

यद्यपि जापान में हिंदू धर्म थोड़ा कम प्रचलित धर्म है, फिर भी जापानी संस्कृति के निर्माण में इसकी महत्वपूर्ण तथा अप्रत्यक्ष भूमिका है। हिंदू धर्म के साथ कई बौद्ध मान्यताएं और परंपराएं चीन से कोरियाई प्रायद्वीप के माध्यम से जापान में फैली थीं। धर्म, कला (भवन निर्माण) व देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना सहित अन्य कई मायनों में जापान की संस्कृति भारतीय संस्कृति से मेल खाती है, आपको जान कर हैरानी होगी कि जापान में भारतीय देवी-देवताओं यथा सरस्वती, शिव व अन्य की पूजा की जाती है। लेकिन, उन्हें बौद्ध रूप में ढाल दिया गया है और रूपांतरित कर दिया गया है। जैसे कि जापानी "किस्मत के सात देवताओं" (Seven Gods of Fortune) में से सरस्वती को बेंज़ाइटेंसामा (Benzaitensama) के रूप में, कुबेर को बिशामोन (Bishamon), महाकाल / शिव को दायकोकुटेन (Daikokuten) और लक्ष्मी को किचिजोटन (Kichijoten) के रूप में पूजा जाता है। इनके अलावा महाकाली को जापानी देवी डाइकोकुटेन्यो (Daikokutennyo) के रूप में पूजा जाता है। यहां तक कि जपान में अनुष्ठानों में हवन भी किये जाते हैं जिसे जापानी में ‘गोमा’ कहा जाता है।

हालांकि भारत में वायु और वरुण जैसे देवताओं को भुला दिया गया है परंतु अभी भी जापान में इनकी पूजा की जाती है। मृत्यु के हिंदू देवता यम, अपने बौद्ध रूप में एन्मा (Enma) के रूप में जाने जाते हैं। विष्णु के वाहन गरुड़ को जापान में एक विशाल, अग्नि-श्वास जीव, करुरा (Karura) के रूप में जाना जाता है। इसमें एक इंसान का शरीर और एक चील का चोंच या चेहरा है। इसके अलावा गणेश जी को यहां कांगिटेन (Kangiten) के रूप में पूजा जाता है। इतना ही नहीं इन देवताओं के लिए जो प्रार्थनाएं हैं, वे संस्कृत भाषा में हैं। कुछ मंदिर हैं जो जापानी भिक्षुओं को संस्कृत सिखाते हैं, परंतु उपयोग की गई लिपि ‘सिद्ध या सिद्धम’ लिपि है जो 5वीं शताब्दी के आसपास भारत में प्रचलित थी। हालांकि अब इन प्रार्थनाओं को ‘देवनागरी’ लिपि से बदल दिया गया है और अब भारत में सिद्ध लिपि का उपयोग नहीं किया जाता है, लेकिन जापान में आज भी सिद्ध या सिध्दम लिपि जीवित है।

परंतु जब राजा अशोक ने भारतीय उपमहाद्वीप में अपने राज्य में बौद्ध धर्म के प्रसार को बढ़ावा दिया तो उन्होंने अपना संदेश फैलाने के लिए लेखन का उपयोग किया और जिसमें खरोष्ठी, अरामाइक और ग्रीक लिपियों का प्रयोग किया गया था। उनकी मृत्यु के वर्षों बाद 1 शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान, बौद्धों ने इस पद्धति को फिर से अपनाया और अपने शास्त्रों को लिखना शुरू कर दिया। हालांकि सम्राट अशोक भी इन लिपियों का इस्तेमाल जानते थे परंतु उन्होंने प्राकृत भाषा में मुख्य रूप से ब्राह्मी लिपि का उपयोग किया था। इस प्रकार सिध्दम लिपि जो जल्द ही चीन और जापान में लोकप्रिय हो गयी थी, उसकी जननी ब्राह्मी लिपि ही थी। यह भी माना जाता है कि पहले के समय में चीनी लिपि में पूरी तरह से बौद्ध छंदों का उच्चारण नहीं हो पाता था, इसलिए चीन में सिद्धम का उपयोग बौद्ध ग्रंथों को प्रसारित करने के लिए किया गया था।

उस समय के आसपास कुकाई और साइचो नामक दो जापानी बौद्ध भिक्षु चीन में रहते थे। जिनमें से कुकाई चीन में संस्कृत और सिद्धम लिपि का विशेष रूप से अध्ययन करने के लिए आए थे। जबकि साइचो को जापानी सम्राट द्वारा चीन में सिद्धांतों का अध्ययन करने और ग्रंथों को जापान लाने के लिए भेजा गया था। दोनों विद्वान चीन से सिद्धम लिपि और बौद्ध धर्मग्रंथों को जापान ले जाने में सफल रहे। कुकाई ने संयोगवश चीनी अक्षरों को जापानी भाषा के साथ जोड़ दिया और ‘काना’ लिपि का आविष्कार किया।

मुख्य रूप से भारतीय प्रवासियों द्वारा जापान में हिंदू धर्म का अभ्यास किया जाता है। 2016 तक, यहां पर 30,048 भारतीय थे। उनमें से अधिकतर हिंदू हैं। हिंदू देवताओं को अभी भी कई जापानियों द्वारा सम्मानित किया जाता है, खासकर शिंगोन बौद्ध धर्म में। जापान में कई हिंदू मंदिर भी हैं:
• शिरडी साईं बाबा टोक्यो मंदिर
• इस्कॉन न्यू गया
• बेंज़ाइटेंसामा मंदिर (सरस्वती मंदिर)
• गणेश मंदिर, असाकुसा

कुछ वक़्त पहले फोटोग्राफ़र (Photographer) बेनॉय के. बहल के फोटोग्राफ़्स की एक प्रदर्शनी हुई, जिससे जापानी देवी-देवताओं की झलक मिली। इनके द्वारा बेंगलुरु में आयोजित एक फोटो प्रदर्शनी में भारत और जापान के बीच के प्राचीन संबंधों को खूबसूरती से दर्शाया गया है। बेनॉय के प्रलेखन भारत और एशिया की कला और संस्कृति को समझने के लिए एक व्यापक और नया परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने एशियाई स्मारकों और कला विरासत की 46,000 से अधिक तस्वीरें ली हैं और कला तथा सांस्कृतिक इतिहास पर 132 प्रलेखी या डाक्यूमेन्टरी (Documentary) बनायी हैं। और सबसे ज्यादा यात्रा करने वाले फोटोग्राफर के रूप में लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स (Limca Book of Records) में उनका नाम दर्ज है।

संदर्भ:
1. https://bit.ly/2EWNDAj
2. https://www.thebetterindia.com/155862/siddham-india-japan-sanskrit-buddhism/
3. https://frontline.thehindu.com/arts-and-culture/heritage/hindu-deities-in-japan/article7654825.ece
4. https://bit.ly/2U0ZQti
5. https://en.wikipedia.org/wiki/Hinduism_in_Japan



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