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पतन की ओर बढ़ता सर्कस

मेरठ

 15-04-2019 02:37 PM
द्रिश्य 2- अभिनय कला

मनोरंजन मानव जीवन का अभिन्‍न अंग रहा है, आज हमारे पास इसके लिए अनगिनत साधन हैं किंतु एक समय वह भी था जब मानव समूह में नाच-गाना कर के ही अपना मनोरंजन करते थे। समय के साथ-साथ मनोरंजन के स्‍वरूप में परिवर्तन आता रहा तथा इसके लिए भिन्‍न भिन्‍न साधनों को अपनाया गया। सर्कस भी ऐसे ही साधनों में से एक था, जिसने एक साथ बहुत बड़े जनसमूह का मनोरंजन किया। यह कला विश्‍व स्‍तर पर प्रसिद्ध हुआ परन्तु आज भारत में एक सर्कस कंपनी चलाना बहुत मुश्किल है और इस कारण आज भारत में सर्कस पतन के कगार पर खड़ा है।

आपने अपने जीवन में कभी न कभी तो सर्कस देखा ही होगा, यह एक चलते-फिरते कलाकारों का समूह होता है जिसमें नट, विदूषक, बाजीगर, जोकर (Joker), स्टंटमैन (Stuntman), कलाबाज, अनेक प्रकार के जानवर (जैसे बाघ, भालू, हाथी, बंदर आदि) एवं अन्य प्रकार के खतरनाक और मनोरंजक करतब दिखाने वाले कलाकार होते हैं। सर्कस एक वृत्तीय या अण्डाकार घेरे (रिंग) में दिखाया जाता है जिसके चारों ओर दर्शकों के बैठने की व्यवस्था की जाती है। वही आपको यह जानकर हैरानी होगी कि विश्व में जब सबसे पहला सर्कस औपनिवेशिक युग में इंग्लैंड (England) और यू.एस.ए. (USA) में शुरू हुआ था तब इन सर्कसों में विदेशी जानवरों और लोगों का आयात एक बड़े पैमाने में जर्मन आपूर्तिकर्ता कार्ल हेगेनबेक (Carl Hagenbeck) द्वारा किया जाता था। 1880 और 1915 के बीच, हेगेनबेक द्वारा भारत के हजारों जंगली जानवरों और कई सड़क-प्रदर्शन करने वाले लोगों को यूरोप और यू.एस.ए. ले जाया गया था।

सर्कस को रोचक और सफल बनाने के लिए दर्शकों की बदलती रुचि के साथ समय समय पर परिवर्तित किया जाता है। भारत में सर्कस का विकास उन्‍नीसवीं सदी में अपने चरम पर पहुंचा, जिसमें विश्‍व भर से कलाकार हिस्‍सा लेने आते थे। फिलिप एस्टली (Philip Astley) नामक राइडिंग मास्टर (Riding master) के अनुसार, भारतीय सर्कस वर्ष 1880 में अस्तित्व में आया। उसने भारत में, कला और मनोरंजन के रूप में सर्कस की नीव रखने का श्रेय विष्णुपंत छत्रे को दिया। छत्रे एक बहु-प्रतिभाशाली व्यक्ति थे, जो कुर्दुवाड़ी के राजाओं के अस्तबल की कमान में थे तथा घोड़ों के माध्‍यम से विभिन्‍न करतब करते थे। कहा जाता है कि राजा और छत्रे दोनों शाही इतालवी सर्कस के इतालवी निर्देशक चियारानी से मिले, जो उसी इतालवी सर्कस में प्रदर्शन कर रहे थे। छत्रे चियारानी के कौशल से काफी प्रभावित हुए। छत्रे ने अपनी पत्नी के साथ अपना स्वयं का सर्कस शुरू करने का फैसला किया और इस तरह, 1880 में भारत में पहली बार सर्कस हुआ, जिसमें दर्शकों के रूप में राजा के साथ कुछ चुनिंदा लोग ही शामिल हुए।

इस प्रकार, छत्रे की सूझबूझ से, भारतीय सर्कस पूरे भारत में फैलने लगा। अपनी प्रत्येक विदेश यात्रा के बाद, छत्रे को निराशा होती थी कि उनका सर्कस अभी भी अंतर्राष्ट्रीय सर्कस के मानकों से मेल नहीं खा पा रहा है। इसलिए उन्होंने सर्कस में सुधार लाने के लिए देश के भीतर नयी कला और कलाकारों की खोज शुरू कर दी। अपनी खोज के दौरान केरल के तेल्लीचेरी शहर में, उनकी मुलाकात कीलेरी कुन्हिकानन नामक एक मार्शल आर्ट (Martial Art) शिक्षक से हुई। छत्रे ने कीलेरी को अपनी सर्कस कंपनी के लिए कलाबाज़ों को सिखाने के लिए कहा और वर्ष 1901 में, कीलेरी ने कोल्लम के पास एक नया सर्कस स्कूल शुरू किया। स्कूल ने जल्द ही लोकप्रियता हासिल कर ली और कलाकारों की एक लंबी सूची पर मंथन करना शुरू कर दिया, जो बाद में अपनी स्वयं की सर्कस कंपनियों को शुरू करने के लिए चले गए। इनमें से एक उल्लेखनीय कंपनी कमला थ्री रिंग सर्कस है, क्योंकि यह अमेरिकी शैली का छह-पोल वाला तीन-रिंग सर्कस था, जो पूरे एशिया में इस तरह का पहला सर्कस था। इन्हीं मुख्य कारणों से, कीलेरी कुन्हिकानन को भारतीय सर्कस के पिता के रूप में जाना जाता है, जिससे कई लोगों को देश और अन्य जगहों पर सफल सर्कस कलाकार बनने में मदद मिली।

आज भारत में भले ही सर्कस का आयोजन करने वालों को अधिक आर्थिक फायदा ना होता हो परन्तु आज भी हमारे देश में कई जगह यह सर्कस का खेल देखा जा सकता है। हमारे मेरठ में भी प्रति वर्ष नौचंदी के मेले में बड़े पैमाने पर सर्कस का आयोजन किया जाता है जिसे देखने पूरे शहर के लोग आते है। 1947 में ब्रिटिश राज की समाप्ति और भारत की स्वतंत्रता के बाद, कई नए सर्कस सामने आए, जिनमें से कुछ प्राचीन मंडली में शामिल हुए। तो आइए आपको ऐसे ही कुछ सर्कस कंपनियों के नाम बताते है जिन्होनें आज भी इस कला को हमारे देश में जीवित रखा है।

• ग्रेट रॉयल सर्कस (Great Royal Circus) भारत में सबसे पुराने सर्कस मंडलों में से एक, ग्रेट रॉयल सर्कस की उत्पत्ति 1909 में हुई, तब इसे मधुकर के सर्कस के रूप में जाना जाता था; 1970 में, जब इसे एन. आर. वालवलकर ने संभाला, तो यह ग्रेट रॉयल सर्कस बन गया। नारायण राव वालवलकर, एक पशु प्रशिक्षक, ने इसे भारतीय सर्कसों में से एक विशेष स्‍थान दिलाया है राव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अफ्रीका-मध्य पूर्व और दक्षिणी एशिया की यात्रा कर चुके हैं।

• ग्रेट रेमन सर्कस और अमर सर्कस (Great Rayman Circus and Amar Circus) ग्रेट रेमन सर्कस भारत की सबसे पुरानी सर्कस कंपनियों में से एक है, जिसकी स्थापना 1920 में कल्लरी गोपालन के शिष्य कल्लन गोपालन और उस दौर के महान भारतीय शोमैन में से एक ने की थी। कुछ समय में, कल्लन गोपालन ने एक सर्कस साम्राज्य बनाया, जिसमें राष्ट्रीय सर्कस और भारत सर्कस शामिल थे। अमर सर्कस, जिसे गोपालन ने 1960 के दशक में बनाया था।

• ग्रेट बॉम्बे सर्कस (Great Bombay Circus) बाबूराव कदम ने 1920 में ग्रेट बॉम्बे सर्कस की स्थापना की। यह शुरुआत में सिंध और पंजाब में शुरू हुई, जो अब पाकिस्तान के प्रांत हैं। के. एम. कुन्हिकानन, कीलेरी कुन्हिकानन के भतीजे और एक बहुमुखी कलाकार, जिन्होंने व्हिटवे और ग्रेट लायन सर्कस का निर्माण किया, उन्होंने 1947 में ग्रेट बॉम्बे सर्कस के साथ अपनी दो कंपनियों का विलय कर दिया - जिसका नाम ग्रेट बॉम्बे सर्कस रखा गया।

1953 में के.एम. कुन्हीकनन की मृत्यु के बाद, उनके भतीजे के. एम. बालगोपाल ने इसे सफल बनाया और ग्रेट बॉम्बे सर्कस में मुख्य भागीदार बने। उनके प्रबंधन के तहत, सर्कस, अपने 300 कर्मचारियों और 60 से अधिक जानवरों वाला भारत में सबसे बड़े सर्कस में से एक बन गया है। इसने श्रीलंका और दक्षिण अफ्रीका में भी अपना प्रदर्शन किया।

1990 में भारत में 300 सर्कस की कंपनियां थीं, जो आज लगभग 30 रह गयी हैं, किंतु आज सर्कस को जीवित रखने के लिए आय से ज्‍यादा व्‍यय हो रहा है तथा इसे किसी प्रकार की आर्थिक सहायता भी नहीं दी जा रही है। 2011 में, सुप्रीम कोर्ट ने 14 साल से कम उम्र के बच्चों को सर्कस में प्रदर्शन करने से प्रतिबंधित कर दिया। साथ ही वर्ष 2013 में भारत में जंगली जानवरों का सर्कस में उपयोग करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, जिसने सर्कस की रोमांचकता को घटा दिया है। भारत में मनोरंजन की इस प्राचीन परंपरा को जीवित रखने के लिए कुछ विशेष परिवर्तन और कदम उठाने की आवश्‍यकता है। सर्कस के लिए बच्‍चों को स्‍कूल (School) या किसी मान्‍यता प्राप्‍त प्रशिक्षण संस्‍थान से एक व्‍यवस्थित पाठ्यक्रम के अनुसार प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, जिससे बच्‍चों का शोषण रोका जा सके। और सेवानियुक्‍त करतबाजों को पर्याप्‍त आर्थिक सहायता प्रदान की जानी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी इसमें रूचि ले सके। सर्कस में कार्य करने वालों के लिए बेहतर मजदूरी, कल्याणकारी उपाय और कानूनी सुरक्षा सहित अन्‍य मूलभूत सुविधा प्रदान कराने की आवश्‍यकता है। वर्तमान में, केरल एकमात्र ऐसा राज्य है जो वयोवृद्ध और अभिजात्य सर्कस कलाकारों को पेंशन प्रदान करता है।

संदर्भ:
1. https://en.wikipedia.org/wiki/Circus
2. https://www.thehindu.com/features/magazine/A-fine-balance/article16079445.ece
3. http://www.circopedia.org/The_Indian_Circus
4. https://bharatstories.in/history-of-circus-in-india/
5. https://rampur.prarang.in/posts/2041/Indias-past-is-linked-to-the-worlds-first-circuses
चित्र सन्दर्भ:
1. https://bit.ly/2Xg88OZ
2. https://www.flickr.com/photos/126377022@N07/14765941032



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