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पतन की ओर बढ़ती मेरठ की हस्तकला

मेरठ

 06-03-2019 01:05 PM
द्रिश्य 3 कला व सौन्दर्य

भारतीय हस्तकला का इतिहास बहुत ही प्राचीन है, भारतीय कला और कलाकार सदियों से दुनिया को अपनी अद्भुत कृतियों से आश्चर्यचकित करते आ रहे हैं। प्राचीन विरासत में भारत की भूमिका किसी से पीछे नहीं है, मिस्र और चीन के साथ मिलकर, भारत ने प्राच्य संस्कृति का भव्य निर्माण किया। भारत की इस अद्भुत हस्तकला को ब्रिटिश काल के दौरान गिरावट का सामना करना पड़ा।

ब्रिटिश काल के दौरान भारत में हस्तकला की गिरावट दो परस्पर विरोधी प्रणालियों के कारण शुरू हुई,जिनमे से पहली प्रणाली ग्रामीण और कृषि तथा दूसरी प्रणाली शहरी और औद्योगिकी थी। साथ ही ब्रिटिश शासन के आगमन के कारण हुए परिवर्तनों को भी हस्तकला में गिरावट का कारण मान सकते हैं। ब्रिटिश द्वारा नई प्रशासनिक प्रणाली, नई भूमि प्रणाली और नई राजस्व प्रणाली कई पुरानी प्रणालियों को खत्म करने के लिए बनाई गयी थी। वहीं बड़े पैमाने पर उत्पादन की कारखाना प्रणाली का विकास भारतीय हस्तशिल्प की गिरावट का प्रत्यक्ष, तत्काल और सबसे महत्वपूर्ण कारण था। हस्तशिल्प के उत्पाद बड़े पैमाने पर उत्पादित कारखाने के उत्पादों के बौछाड़ के साथ बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते थे।

ब्रिटिश द्वारा बाजार में पकड़ बनाने के लिए ब्रिटिश साहूकार ने क्षेपण का सहारा लिया यानी विदेशी बाजार में कम मूल्य पर विक्रय करना और स्वदेश में महंगे में विक्रय करना। तभी भारतीय शिल्पकार को अपनी उत्पादन लागत को कम करने में मुश्किल होने लगी। साथ ही वह ना तो बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं को प्राप्त कर सकता था और ना ही साहूकार की तरह सस्ते में माल बेच सकता था। इसके अलावा, कलात्मक उत्पादों की कीमत असामान्य रूप से अधिक रहती है क्योंकि उन्हें बहुत अधिक श्रमिकों की आवश्यकता होती है।

स्वदेशी पूंजीवाद (शहरी और ग्रामीण दोनों) जिसका पश्चिमी औद्योगिक पूंजी के लिए पतन के रूप में आगमन हुआ था, ने हस्तशिल्प पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाला। वहीं कई भारतीय साहूकार ब्रिटिशों के लिए एजेंट के रूप में काम करने लगे और इस परिवर्तन ने भी हस्तशिल्पियों को प्रभावित किया। शहरों में ब्रिटिश साहूकार उद्योग और व्यापार करने लगे और गांवों में भारतीय शहरी साहूकारों ने कमान पकड़ ली थी। वे वहाँ से उत्पाद खरीद कर वितरित करते और अधिक तीव्रता के साथ कच्चे माल की खरीद कर गाँवों में बेचते। उसके बाद ग्रामीण केंद्रों में नए उद्योग शुरू किए गए और इन नए उद्योगों ने नए अवसरों का निर्माण किए बिना काम के पारंपरिक अवसरों को नष्ट कर दिया।

आधुनिक कारखाने और बड़ी पूंजी के साथ नए कारखानों की वृद्धि के सामने शिल्पकार की कार्यशाला एक आर्थिक अराजकता बन गयी। अब वह ना तो अपनी कार्यशाला को बंद कर सकता था और ना ही उसे चला सकता था। यदि वह कार्यशाला को बंद करता तो बेरोजगार हो जाता और यदि चलाए रखता तो कंगाल हो जाता। आखिरकार कई कारीगरों ने अपनी कार्यशालाओं को बंद कर दिया और कृषि श्रमिक बन गए और कुछ दो वक्त की रोटी प्राप्त करने के लिए इसी कारोबार को करते रहे।

पूंजीवाद के बाद भारतीय हस्तशिल्प को प्रभावित करने के लिए जमींदारी प्रथा का उदय हुआ। इस प्रथा के चलते कई किसानों की आर्थिक स्थिति खराब होने लगी, खराब आर्थिक स्थिति के चलते हस्तशिल्प उत्पादों की मांग में तेजी से गिरावट आने लगी। संयुक्त परिवार के टूटने से भी कई हस्तशिल्पों को प्रभावित होना पड़ा। सभी संयुक्त परिवारों के रूप में, शिल्पकारों के परिवार भी सामूहिक श्रम, सामान्य स्वामित्व और आम आय और व्यय पर आधारित थे। लेकिन गाँव के पैसे की अर्थव्यवस्था में कमी होने के कारण घर टूटनें लगे और लोगों ने खुद के लिए कमाना आरंभ कर दिया। वहीं कई युवा पुरुष अपने परिवारों के पारंपरिक पेशों को छोड़ कर औद्योगिक नौकरियां लेने के लिए शहरों में चले गए। इससे कई शिल्प जो कुछ परिवारों की विशिष्टताएं थीं, परिवारों के टूटने से समाप्त हो गई।

जाति के आधार पर कार्य के विभाजन ने भी हस्तशिल्प पर प्रतिकूल प्रभाव डाला था। साथ ही जाति व्यवस्था के विघटन से कुछ विशेष शिल्प उत्पादों के उपभोग की मात्रा पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। वहीं हस्तशिल्प की गिरावट कुछ हद तक भारतीय प्रणालियों की कुछ अंतर्निहित कमजोरियाँ जो सामंती समय में भी अस्तित्व में थी, की वजह से भी प्रभावित हुई थी। इसके अलावा, यूरोपीय शहरों के विपरीत भारतीय शहरों में व्यापार और उद्योग के लिए मजबूत आर्थिक व्यवस्था मौजूद नहीं थी।

एक अन्य कारक जिसने हस्तशिल्प के क्षय में योगदान दिया, वह अंग्रेजों के अधीन भारत में व्यापार और औद्योगिक नीति थी। ब्रिटिश वैज्ञानिक आविष्कारों के परिणामस्वरूप औद्योगिक क्रांति को लाने वाला विश्व का पहला देश था, ब्रिटेन में कई कारखानों की स्थापना होने लगी, जिसकी वजह से ब्रिटिश को भारत के हस्तशिल्पों की आवश्यकता नहीं पड़ी, बल्कि उन्हें अपने कारखानों में उत्पादों का निर्माण करने के लिए कच्चे माल की आवश्यकता थी, जिसे उन्होंने भारत से पुर्ण किया। और अपने उद्योगों की प्रगति में ब्रिटिश भारतीय हस्तशिल्प को बाधा मानते थे। इसलिए हस्तशिल्प के विकास में बाधा डालने के लिए उन्होंने विभिन्न व्यापार प्रतिबंधों को भारत में लागू कर दिया था।

कुछ इसी प्रकार का हाल आज मेरठ की कैंची का है, कम लागत वाली चीनी कैंची के द्वारा दी जा रही तीव्र प्रतिस्पर्धा के कारण मेरठ की कैंची काफी प्रभावित हो रही है। 2013 से एक विश्व व्यापार संगठन भौगोलिक संकेत में पंजीकृत उत्पाद होने के बावजूद, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त करने के लिए कैंची को अभी काफी योग्य होने की आवश्यकता है। मेरठ में कैंची निर्माण के लिए 350 साल पुराना कुटीर उद्योग मौजूद है। कहा जाता है कि एक स्थानीय लोहार अखुनजी ने 1645 में मुगल काल के दौरान चमड़े को काटने के लिए दो तलवारों को मिलाकर भारत में पहली कैंची का स्वरूप बनाया था। हालांकि वहाँ के निर्माताओं का दावा है कि चीनी कैंची से भारी कराधान और प्रतिस्पर्धा के मुद्दों को संबोधित करे बिना इस उद्योग को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता।

संदर्भ :-
1. https://bit.ly/2NPUONX
2. Abraham,T.M. Handicrafts In India 1964 Graphics Columbia New Delhi



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