कैसे परिभाषित किया बापू ने हिन्दू धर्म को?

मेरठ

 30-01-2019 05:20 PM
विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

‘भारत एक विवधताओं का राष्ट्र है’, इस बात को जितनी बार दोहराया जाए, कम है। और भारत की ये विविधताएँ भी एक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं हैं। भिन्न पशु, पक्षी, संस्कृति, धर्म, जाति आदि सभी मिलकर हमारी इस विविधता को परिभाषित करते हैं। और जहाँ विविधता होती है, वहाँ कुछ विवाद न हों ऐसा कम ही देखने को मिलता है। परन्तु इन विवादों से दूर, शान्ति का सन्देश देने वाला एक महात्मा भी हमारी भारत की भूमि से ही जन्मा था, जिसका नाम था मोहनदास करमचंद गाँधी। गांधीजी ने सदैव ही एकता और समानता की बात कही। भारत की इस विविधता में ही वे भारत की शक्ति देखते थे। परन्तु क्या आप जानते हैं कि उनके खुद के धार्मिक विचार क्या थे? तो आइये आज जानते हैं कि गांधीजी ने किस प्रकार ‘हिन्दू’ धर्म को समझाने की कोशिश की।

गांधीजी से एक बार सवाल पूछा गया कि, “एक हिन्दू कौन है? हिन्दू शब्द का मूल क्या है? क्या हिंदुत्व नाम की कोई चीज़ होती है?”। गांधीजी ने अपने जवाब में कहा:

मैं एक इतिहासकार नहीं हूँ, और न ही मैं कहता हूँ कि मुझे इतिहास के बारे में अधिक ज्ञान है। पर मैंने हिंदुत्व पर आधारित एक विश्वसनीय किताब में पढ़ा है कि ‘हिन्दू’ शब्द वेदों से नहीं निकला है बल्कि जब सिकंदर ने भारत पर हमला किया था, तब सिन्धु के पूर्व की दिशा में बसे लोगों को हिन्दू कहा जाता था। ग्रीक भाषा में सिन्धु का ‘स’ बदलकर ‘ह’ बन गया था जिससे निकला हिन्दू। और इन्हीं लोगों के धर्म को हिन्दू धर्म बोला गया और यह बताया गया कि यह एक बहुत ही सहिष्णुता रखने वाला धर्म है। इन हिन्दुओं ने शुरुआती ईसाईयों, यहूदियों और पारसियों, सभी को पनाह दी। मुझे उस हिन्दू धर्म का हिस्सा होने पर गर्व है जो सहनशीलता के लिए जाना जाता था।

आर्य विद्वान् इस धर्म को वैदिक धर्म मानते थे तथा हिंदुस्तान को आर्यवर्त के नाम से जाना जाता था। मेरा ऐसा विश्वास नहीं है। मेरि धारणा में हिंदुस्तान एक सर्व-संपन्न राष्ट्र है। जी हाँ, हिन्दू धर्म में वेद भी शामिल हैं, परन्तु उनके अलावा भी बहुत कुछ शामिल है। मैं बिना किसी संदेह के, हिन्दू धर्म के गौरव को बिना ठेस पहुंचाए ये कह सकता हूँ कि मैं इस्लाम, ईसाई धर्म, पारसी धर्म और यहूदी धर्म के प्रति भी श्रद्धा रखता हूँ। और ऐसा हिन्दू धर्म तब तक ज़िन्दा रहेगा जब तक आकाश में सूर्य चमकता रहेगा। तुलसीदास ने अपने इस एक दोहे में इस पूरी बात को बड़े अच्छे से समझाया है:

दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान।
तुलसी दया न छांड़िए ,जब लग घट में प्राण।।

इस एक जवाब के अलावा भी गांधीजी ने अपने प्रकाशन ‘यंग इंडिया’ (Young India) में कई बार हिन्दू धर्म को समझाने की कोशिश की है:

हिंदू धर्म का मुख्य मूल्य इस वास्तविक विश्वास को धारण करने में निहित है कि सभी जीवन (न केवल मनुष्य, बल्कि सभी भावुक प्राणी) एक है, अर्थात सभी जीवन एक ही सार्वभौमिक स्रोत से आते हैं।

सभी जीवन की यह एकता हिंदू धर्म की ख़ासियत है जो केवल मनुष्यों को ही मोक्ष प्रदान नहीं करती है, लेकिन यह कहती है कि यह सभी ईश्वर के जीवों के लिए संभव नहीं है। यह हो सकता है कि मनुष्यों के अलावा किसी और के लिए ऐसा संभव नहीं है, परन्तु ऐसे में मानव इस सृष्टि का स्वामी नहीं बन जाता है। बल्कि यह उसे ईश्वर की रचना का सेवक बनाता है। अब जब हम भाईचारे की बात करते हैं, तो हम मनुष्यों तक ही रुक जाते हैं, और महसूस करते हैं मनुष्य के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अन्य सभी जीवन का शोषण किया जा सकता है। परन्तु हिन्दू धर्म में इस शोषण के लिए कोई स्थान नहीं है। जीवन की इस एकता को समझने से पहले हो सकते है आप कई बलिदान कर दें, परन्तु इसे एक बार समझ जाने के बाद आपकी ज़रूरतें कम हो जाएंगी। यह आधुनिक सभ्यता की सीख के बिलकुल विपरीत है जहाँ अपनी ज़रूरतों को बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन दिया जाता है। जो ऐसा मानते हैं, वे सोचते हैं कि अपनी ज़रूरतों को बढ़ाकर हम अपने ज्ञान में वृद्धि कर रहे हैं। इसके विपरीत हिन्दू धर्म भोगों और ज़रूरतों को खारिज करता है क्योंकि इससे एक व्यक्ति की स्वयं से सार्वभौमिक पहचान की वृद्धि में बाधा आती है।

हिंदू धर्म गंगा की तरह शुद्ध है और अपने स्रोत पर बिलकुल साफ़ है, लेकिन गंगा की ही तरह अपने रास्ते में यह भी कुछ अशुद्धियों को ले जा रहा है। गंगा की तरह भी यह अपने कुल प्रभाव में फायदेमंद है। यह प्रत्येक प्रांत में एक प्रांतीय रूप लेता है, लेकिन आंतरिक पदार्थ हर जगह बरकरार रहता है। रिवाज धर्म नहीं है। रिवाज बदल सकता है, लेकिन धर्म अटल रहेगा।

हिंदू धर्म की पवित्रता उसके अनुयायियों के आत्म-संयम पर निर्भर करती है। जब भी उनका धर्म खतरे में पड़ा है, हिंदुओं ने कठोर तपस्या की है, खतरे के कारणों की खोज की है और उनसे मुकाबला करने के लिए साधन तैयार किए हैं। शस्त्र तो हमेशा बढ़ते ही रहेंगे। वेद, उपनिषद, स्मृति शास्त्र, पुराण और सारा इतिहास एक ही समय में नहीं लिखा गया था। प्रत्येक को उस विशेष अवधि की आवश्यकता के अनुसार बनाया गया था, और इसीलिए इनमें असमानताएं भी मिलती हैं। ये पुस्तकें शाश्वत सत्य का उल्लेख नहीं करती हैं, लेकिन यह दिखाती हैं कि जिस समय ये पुस्तकें लिखी गयीं थीं, उस समय इनका अभ्यास कैसे किया जाता था। एक अभ्यास जो एक विशेष अवधि में काफी अच्छा था, अगर नेत्रहीन रूप से दूसरे में दोहराया जाता है, तो लोगों को निराशा और तिरस्कार का सामना करना पड़ सकता है। क्योंकि एक समय में पशु-बलि की प्रथा निभाते थे, क्या आज हम इसे पुनर्जीवित करेंगे? क्योंकि एक समय हम गोमांस खाते थे, क्या हम अब भी ऐसा करेंगे? क्योंकि एक समय में, हम चोरों के हाथ और पैर काट देते थे, क्या आज हम उस बर्बरता को फिर से जिंदा करेंगे? क्या हम बहुपतित्व को पुनर्जीवित करेंगे? क्या हम बाल-विवाह को पुनर्जीवित करेंगे? क्योंकि हमने एक समय पर मानवता के एक हिस्से को त्याग दिया था, क्या हम आज उनके वंशजों का बहिष्कार करेंगे?

हिन्दू धर्म ठहराव के खिलाफ है। ज्ञान असीम है और इसलिए सत्य का अनुप्रयोग भी। हर दिन हम अपनी ज्ञान की शक्ति में कुछ नया जोड़ते हैं, और हम ऐसा करते रहेंगे। नया अनुभव हमें नए कर्तव्य सिखाएगा, लेकिन सच्चाई हमेशा एक ही होगी। किसने कभी इसे अपनी संपूर्णता में जाना है?

सन्दर्भ:
1.https://goo.gl/XVJTXW
2.https://goo.gl/Ldxz4n

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