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भारत में महत्वपूर्ण पर्यावरण संरक्षण अधिनियम क्या हैं?

मेरठ

 22-01-2019 02:41 PM
नगरीकरण- शहर व शक्ति

राष्ट्रीय और साथ ही वैश्विक स्तरों पर उभरती हुई समस्याओं को ध्यान में रखते हुए पर्यावरण की सुरक्षा एवं गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए पर्यावरण संरक्षण अधिनियम बनाये गये हैं। भारतीय संविधान में सरकार ने दो महत्वपूर्ण अनुच्छेद (भाग IVA आर्टिकल 51A और भाग IV आर्टिकल 48A) जोड़े हैं। अनुच्छेद 48A राज्य सरकार को आदेश देता है कि वह पर्यावरण की सुरक्षा और उसमें सुधार सुनिश्चित करने का प्रयास करे, तथा देश के वनों तथा वन्यजीवन की रक्षा करे। अनुच्छेद 51A नागरिकों को कर्तव्य प्रदान करता है कि वे वनों, झीलों, नदियों और वन्य जीवन सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करें और जीवित प्राणियों के प्रति दयालु रहें।

भारत में आज़ादी से पहले भी कई पर्यावरण संरक्षण कानून मौजूद थे। परंतु पूर्ण रूप से विकसित ढांचे को लागू करने के लिए ज़ोर आया मानव पर्यावरण पर हुए संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (स्टॉकहोम) के बाद। सन् 1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन ने भारत सरकार का ध्यान पर्यावरण संरक्षण की ओर खींचा। इस सम्मेलन के बाद, पर्यावरण और संबंधित मुद्दों की देखभाल के लिए एक नियामक निकाय स्थापित करने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के भीतर 1972 में पर्यावरण नीति और योजना के लिए राष्ट्रीय परिषद की स्थापना की गई थी। यह परिषद बाद में पर्यावरण और वन मंत्रालय (एम.ओ.ई.एफ.) में पूर्ण विकसित हुई, जिसकी स्थापना 1985 में हुई, जो आज पर्यावरण संरक्षण को विनियमित करने तथा नियामक ढांचे को तैयार करने के लिए देश में सर्वोच्च प्रशासनिक निकाय है। 1970 के दशक के बाद से, कई पर्यावरण विधानों को सामने रखा गया है। आज भारत में पर्यावरण और वन मंत्रालय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मिलकर इस क्षेत्र के नियम कानून बनाते हैं।

समय के साथ औद्योगीकरण, शहरीकरण तथा जनसंख्या वृद्धि से पर्यावरण की गुणवत्ता में निरंतर कमी आती गई। पर्यावरण की गुणवत्ता की इस कमी में प्रभावी नियंत्रण व प्रदूषण के परिप्रेक्ष्य में सरकार ने समय-समय पर अनेक कानून व नियम बनाए जो कि निम्नलिखित हैं:

1. वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981
2. जैव-विविधता अधिनियम, 2002
3. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986
4. वन संरक्षण अधिनियम, 1980
5. भारतीय वन अधिनियम, 1927
6. राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण अधिनियम, 2010
7. पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001
8. सार्वजनिक दायित्व बीमा अधिनियम 1991
9. अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006
10. जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण ) अधिनियम, 1974
11. वन्य जीवन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2002
12. वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम 1972
13. ध्वनि प्रदूषण अधिनियम
14. खतरनाक अपशिष्ट हैंडलिंग और प्रबंधन अधिनियम, 1989, आदि

भारत में पर्यावरण संबंधित उपरोक्त कानूनों का निर्माण, समय-समय पर होता आया है, परंतु आज पर्यावरण प्रदूषण देश में इतना व्यापक हो गया है कि इनकी महत्वता को समझना अति आवयश्क हो गया है। इसमें से कुछ महत्वपूर्ण पर्यावरण संरक्षण के कानून व नियम हैं, जिनका विस्तारपूर्वक वर्णन निम्नलिखित हैं।

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण अधिनियम, 2010
राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण अधिनियम, 2010 द्वारा भारत में एक राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) की स्थापना की गई है। इस अधिनियम के तहत पर्यावरण से सम्बन्धित कानूनी अधिकारों को लागू करने एवं व्यक्तियों और सम्पत्तियों के नुकसान के लिए सहायता और क्षति-पूर्ति देने या उससे संबंधित या उससे जुड़े मामलों सहित, पर्यावरण संरक्षण एवं वनों तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित मामलों के प्रभावी और त्वरित निपटारे के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना की गयी। इस अधिनियम को 2 जून, 2010 को भारत के राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त हुई, और इसे केंद्र सरकार ने अधिसूचना संख्या एस. ओ. 2569 (ई) दिनांक 18 अक्टूबर, 2010, के माध्यम से लागू किया। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रवर्तन के परिणामस्वरूप राष्ट्रीय पर्यावरण प्राधिकरण अधिनियम, 1995 और राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण अधिनियम, 1997 को निरस्त कर दिया गया। इस प्रकार पर्यावरण से संबंधित किसी भी कानूनी अधिकार को लागू करने और क्षति के लिए राहत और क्षतिपूर्ति सहित वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के पर्यावरण संरक्षण और संरक्षण से संबंधित मामलों के प्रभावी और शीघ्र निपटान के लिए राष्ट्रीय ग्रीन ट्रायब्यूनल सहायता अधिकार प्रदान करता है।

वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981
बढ़ते औद्योगीकरण के कारण पर्यावरण में निरंतर हो रहे वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए यह अधिनियम बनाया गया। यह वायु प्रदूषण की रोकथाम, नियंत्रण, उन्मूलन तथा पूर्वोक्त उद्देश्यों को पूरा करने की दृष्टि से केंद्र और राज्य स्तरों पर बोर्डों की स्थापना के लिए एक अधिनियम है। इस अधिनियम में मुख्यत: मोटर-गाडियों और अन्य कारखानों से निकलने वाले धुएं और गंदगी का स्तर निर्धारित करने तथा उसे नियंत्रित करने का प्रावधान है।

यह अधिनियम प्रदूषणकारी ईंधन और पदार्थों के उपयोग को रोकने के साथ-साथ वायु प्रदूषण को बढ़ावा देने वाले उपकरणों को विनियमित करके वायु प्रदूषण को कम करने में सहायक है। ये वायु अधिनियम राज्य सरकार को, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से परामर्श के बाद, किसी भी क्षेत्र या क्षेत्रों को वायु प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्र या क्षेत्रों के रूप में घोषित करने का अधिकार देता है। अधिनियम के तहत, प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्र में किसी भी औद्योगिक संयंत्र की स्थापना या संचालन के लिए राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से सहमति की आवश्यकता होती है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से वायु प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्रों में वायु का परीक्षण करने और प्रदूषण नियंत्रण उपकरण तथा विनिर्माण प्रक्रियाओं का निरीक्षण करने की उम्मीद की जाती है।

जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974
उद्योगों की वृद्धि तथा शहरीकरण की बढ़ती प्रवृति के फलस्वरूप नदी तथा दरियाओं के प्रदूषण की समस्या काफी आवश्यक व महत्वपूर्ण बन गयी थी। इस कारण जल प्रदूषण निवारण और नियंत्रण अधिनियम, 1974 को जल प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण के लिए और देश में पानी की पूर्णता को बनाए रखने या बहाल करने के लिए अधिनियमित किया गया। इस अधिनियम ने एक संस्थागत संरचना की स्थापना की ताकि वह जल प्रदूषण रोकने के उपाय करके स्वच्छ जल आपूर्ति सुनिश्चित कर सके। इस कानून ने एक केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की स्थापना की। यह अधिनियम, जल निकायों में प्रदूषक तत्वों के निर्वहन (निर्धारित मानक से ऊपर) को प्रतिबंधित करता है, और जो व्यक्ति इसका पालन नहीं करता है उसे निर्धारित दंड दिया जाता है। इस कानून में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारों को समुचित शक्तियाँ दी गई हैं ताकि वे अधिनियम के प्रावधानों को ठीक से कार्यान्वित कर सकें।

इसके अलावा, जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) उपकर अधिनियम, 1977 भी एक अन्य महत्वपूर्ण कानून है, जो कुछ प्रकार की औद्योगिक गतिविधियों को संचालित करता है। यह साधनों में वृद्धि करने की दृष्टि से कुछ उद्योग चलाने वाले व्यक्तियों और स्थानीय प्राधिकरणों द्वारा उपभोग किये गए जल पर उपकर के संग्रहण करने के लिये अधिनियम है। इस उपकर अधिनियम को जल प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण के लिए केंद्रीय बोर्ड और राज्य बोर्डों के संसाधनों को बढ़ाने के उद्देश्य से जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के तहत गठित किया गया है। इस अधिनियम को अंतिम बार 2003 में संशोधित किया गया था।

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 पर्यावरण की सुरक्षा और सुधार के लिए जारी किया था। यह अधिनियम पर्यावरणीय सुरक्षा की दीर्घकालिक आवश्यकताओं का अध्ययन, योजना और कार्यान्वयन के लिए एक रूपरेखा तैयार करता है और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली स्थितियों के लिए त्वरित और पर्याप्त प्रतिक्रिया की व्यवस्था करता है। यह एक विशाल अधिनियम है जिसे जल अधिनियम, 1974 और वायु अधिनियम के तहत स्थापित केंद्रीय और राज्य प्राधिकरणों के समन्वय के लिए एक रूपरेखा प्रदान करने के लिए बनाया गया था। इसमें जल, वायु और भूमि के साथ-साथ अंतर्संबंध भी शामिल है जो जल, वायु एवं भूमि, मानव, अन्य जीवित प्राणियों, पौधों, सूक्ष्म जीवों और संपत्ति के बीच मौजूद होते हैं।

इस अधिनियम के तहत केंद्र सरकार पर्यावरण प्रदूषण को प्रशासित करने के लिए नियम और अधिनियम भी बना सकती है। समय-समय पर, केंद्र सरकार पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए पर्यावरण अधिनियम के तहत अधिसूचना जारी करती है या पर्यावरण अधिनियम के तहत मामलों के लिए दिशानिर्देश जारी करती है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम या उक्त अधिनियम के तहत किसी भी नियम या निर्देश के उल्लंघन की स्थिति में दंड को भी शामिल किया गया है। यदि इस प्रकार का कोई भी उल्लंघन होता है, तो उल्लंघनकर्ता को पांच साल तक कारावास या 1,00,000 रुपये तक का जुर्माना देता पड़ता है।

खतरनाक अपशिष्ट प्रबंधन नियम
खतरनाक अपशिष्ट का मतलब किसी ऐसे कचरे से है, जो अपनी भौतिक, रासायनिक, प्रतिक्रियाशील, विषाक्त, ज्वलनशील, विस्फोटक या संक्षारक विशेषताओं के कारण खतरे का कारण बनता है या स्वास्थ्य तथा पर्यावरण के लिए खतरा उत्पन्न होने की संभावना पैदा करता है। ऐसे कई विधान हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खतरनाक अपशिष्ट प्रबंधन से निपटते हैं। इससे संबंधित कानून फैक्ट्रीज़ एक्ट, 1948 (Factories Act), सार्वजनिक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991 तथा राष्ट्रीय पर्यावरण प्राधिकरण अधिनियम, 1995 हैं। इनके अलावा इससे संबंधित पर्यावरण अधिनियम के तहत नियम भी हैं। खतरनाक अपशिष्ट प्रबंधन से निपटने वाले कुछ नियमों का विवरण नीचे दिया गया है:

(a) खतरनाक अपशिष्ट (प्रबंधन, हैंडलिंग और ट्रांसबाउन्ड्री) नियम, 2008 (Hazardous Wastes (Management, Handling and Transboundary) Rules, 2008)
इस नियम के तहत खतरनाक रसायनों के निर्माण, भंडारण, आयात और खतरनाक कचरे के प्रबंधन के लिए एक मार्गदर्शिका तैयार की जाती है।

(b) बायोमेडिकल अपशिष्ट (प्रबंधन और हैंडलिंग) नियम 1998 (Biomedical Waste (Management and Handling) Rules, 1998)
इसे संक्रामक कचरे के उचित निपटान, पृथक्करण, परिवहन, आदि के लिए तैयार किया गया था।

(c) नगरीय ठोस अपशिष्ट (प्रबंधन और हैंडलिंग) नियम, 2000
इसका उद्देश्य नगरपालिकाओं को वैज्ञानिक तरीके से नगरिय ठोस कचरे को निपटाने में सक्षम बनाना है।

(d) ई-कचरा (प्रबंधन और हैंडलिंग) नियम, 2011
इस नियम को 1 मई, 2011 को अधिसूचित किया गया था और ये 1 मई, 2012 से प्रभावी हो गया था, जिसका प्राथमिक उद्देश्य बिजली और इलेक्ट्रॉनिक (Electronic) उपकरणों में खतरनाक पदार्थों के उपयोग को कम करना, देश में ई-कचरे को रोकना और खतरनाक पदार्थों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाना है।

(e) बैटरी (प्रबंधन और हैंडलिंग) नियम, 2001
यह नियम लेड एसिड बैटरियों (Lead Acid Battery) के कचरे से निपटने के लिए उचित और प्रभावी प्रबंधन करता है।

हमारी नीतियाँ पर्यावरण संरक्षण में भारत की पहल दर्शाती हैं। परंतु पर्यावरण संबंधी सभी विधेयक होने पर भी भारत में पर्यावरण की स्थिति काफी गंभीर बनी हुई है। आज पर्यावरण को सुरक्षित करने के प्रयासों में आम जनता की भागीदारी भी सुनिश्चित करने की ज़रूरत है।

सदंर्भ:
1.http://www.mindmapcharts.com/index.php/gk/environment/120-important-environmental-acts-in-india
2.http://www.mondaq.com/india/x/624836/Waste+Management/Environment+Laws+In+India



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