पौधों के नहीं बल्कि मानव के ज़्यादा करीब हैं मशरूम

मेरठ

 10-12-2018 01:18 PM
फंफूद, कुकुरमुत्ता

जीव जगत को पोषण के आधार पर दो भागों में वर्गीकृत किया गया है-स्‍वपोषी और परपोषी। मानव एक परपोषी जीव है क्‍योंकि वह अपने भोजन के लिए पूर्णतः दूसरों अर्थात पेड़-पौधों, जीव-जन्‍तुओं पर निर्भर है। जबकि पेड़ पौधे स्‍वपोषी जीव हैं, क्‍योंकि वे प्रकाश संश्‍लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन स्‍वयं तैयार करते हैं। किंतु एक पौधा ऐसा है, जो अपना भोजन पूर्णतः मृतजीवों या सड़ी गली वस्‍तुओं से ग्रहण करता है, फिर भी उसे हमारे द्वारा बड़े चाव से खाया जाता है। यह विचित्र खाद्य पदार्थ है "मशरूम", जिसे हम सब्‍जी के रूप में ग्रहण करते हैं किंतु वास्‍तव में यह कवकों का एक सूक्ष्‍म रेशेदार फल है।

पृथ्‍वी में जीवन की उत्‍पत्ति करोड़ों वर्ष पूर्व हो गयी थी, किंतु सभी जीवों को समान श्रेणी में नहीं आंका जा सकता। इसके लिए एरिस्टोल (एक प्राचीन ग्रीक दार्शनिक और वैज्ञानिक) ने रक्‍त के आधार पर इस जीव जगत को दो भागों में वर्गीकृत किया वनस्‍पति जगत (रक्‍त रहित) और जीव जगत (रक्‍त सहित)। आगे चलकर इन्हें भी पांच भागों में वर्गीकृत किया गया था। जीव-जगत के वर्गों में पांचवा स्‍थान कवकों को मिला, जिसे 1969 तक जन्‍तुओं की एक विशिष्‍ट श्रेणी के रूप में आंका जा रहा था। आधुनिक तकनीकी विकास के कारण आज हम जीव और प्रजाति के मध्‍य अनुवांशिक संबंध स्‍थापित करने में सक्षम हो पाये हैं। इनके माध्‍यम से कवकों पर गहनता से अध्‍ययन किया गया तो वे पेड़ पौधों की अपेक्षा मानव के ज्‍यादा निकट साबित हुए। इसको हम मानव शरीर में होने वाली कवक संक्रमण से भी समझ सकते हैं जिसका उपचार विषाणु संक्रमण तथा जीवाणु संक्रमण की तुलना में कठिन होता है, जो मानव और कवक के मध्‍य आनुवांशिक संबंध को दर्शाता है।

जीवों के पूर्वजों की भांति करोंड़ों वर्ष पूर्व कवक के पूर्वज भी एक कोशिकीय थे, जिनमें विकास के उपरांत एक मजबूत कोशिका भित्ति (कवक) का निर्माण हुआ। ये कवक हरित लवक की अनुपस्थिति के कारण अपना भोजन मृत जीवों तथा सड़े गले पेड़-पौधों इत्‍यादि से ग्रहण करते हैं। करोड़ों वर्ष पुरानी यह प्रजाति अनुकुलित वातावरण के अभाव में अब विलुप्ति के कगार पर आने लगी है। कवक का ही एक अभिन्‍न अंग है मशरूम (कुकुरमुत्‍ता) जिसका शरीर थेलसनुमा होता है इसे हम जड़, तना, पत्ति में विभाजित नहीं कर सकते। मशरूम आज अपनी पौष्टिकता और स्‍वाद के कारण हमारी रसोई का अभिन्‍न हिस्‍सा बन गया है।

किंतु मशरूम की पहचान के लिए मैक्रोस्कोपिक (macroscopic) संरचना का ज्ञान होना जरूरी है। मशरूम के गिल में बीजाणु (बेसिडियोस्पोर्स(basidiospores)) उत्‍पन्‍न होते हैं जो इसके छत्‍ते से महीन पाउडर के रूप में गिरते हैं। जब मशरूम को काटकर रात भर रखा जाता है, तो इसके गिल में से दिया पाउडर निकलता है, इस पाउडर के रंग से मशरूम का वर्गीकरण किया जाता है। आधुनिक दौर में कई उपकरण और उपलब्ध हो गये हैं, जिनके माध्‍यम से आसानी से मशरूम का वर्गीकरण किया जा सकता है।

एगारिकस बिस्पोरस (Agaricus bisporus) सबसे लोकप्रिय मशरूम में गिना जाता है, जो विश्‍व के अधिकांश क्षेत्र में पायी जाती है। मशरूम की कई प्रजातियां रातों रात विकसित हो जाती हैं, जबकि कई को विकसित होने में कई दिन का समय लगता है, वर्षा ऋतु में मशरूम तीव्रता से विकसित होते हैं। चीन, कोरिया, यूरोप, जापान, भारत जैसे देशों में मशरूम से भिन्‍न भिन्‍न व्‍यंजन तैयार किये जाते हैं, मशरूम को सब्जी की दुनिया के "मांस" के रूप में जाना जाता है। मशरूम का उपयोग ऊन, प्राकृतिक तंतु आदि बनाने के लिए भी किया जाता है साथ ही कृत्रिम रंगों के उत्‍पादन से पहले मशरूम का उपयोग वस्‍त्रों को रंगने के लिए भी किया जाता था। आज विभिन्‍न क्षेत्रों में मशरूम की कृषि को व्‍यवसाय की दृष्टि से काफी बढ़ावा दिया जा रहा है। छोटे किसानों के लिए यह एक अच्‍छा विकल्‍प भी है।

संदर्भ:
1.
https://www.scienceabc.com/nature/how-are-mushrooms-more-similar-to-humans-than-plants.html
2.https://en.wikipedia.org/wiki/Mushroom



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