Machine Translator

समझिये इन 12 भारतीय कला शैलियों को गहराई से

मेरठ

 24-11-2018 12:50 PM
द्रिश्य 3 कला व सौन्दर्य

भारत हमेशा से ही विभिन्न प्रकार की संस्‍कृति से समृद्ध देश रहा है। यहां के हर राज्‍य में कला की अपनी एक विशेष शैली है जिसे लोक कला के नाम से जाना जाता है। जिनकी अपनी विशेष सांस्‍कृतिक और पारम्‍परिक पहचान है। भारतीय कला परंपरा में लोक कलाओं का गहरा रंग देखने को मिलता है। कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक लोक कलाओं की समृ‍द्ध विरासत फैली हुई है। तथापि, लोक कला केवल चित्रकारी तक ही सीमित नहीं है। इसके अन्‍य रूप भी हैं जैसे कि मिट्टी के बर्तन, गृह सज्‍जा, ज़ेवर, कपड़ा डिज़ाइन आदि। हम आपको भारत की कुछ प्रसिद्ध लोक कलाओं के विभिन्न रूपों के दर्शन कराने जा रहे हैं, जोकि इतनी सजीव और प्रभावशाली हैं कि ये देश में ही नहीं अपितु विदेशी पर्यटकों के बीच भी बहुत लोकप्रिय हैं:

1. मधुबनी चित्रकारी- बिहार:


इसकी उत्पत्ति बिहार प्रांत के 'मधुबनी नगर' से हुई थी। इसे मिथिला की कला भी कहा जाता है, (क्‍योंकि यह बिहार के मिथिला प्रदेश में पनपी थी) कहा जाता है कि ऐसे खूबसूरत चित्र मिथिला के राजा जनक ने अपनी बेटी सीता के विवाह के दौरान कलाकारों द्वारा बनवाए थे। यह मुख्य रूप से, पौराणिक कथाओं, हिंदू देवताओं और विभिन्न शाही दरबारों के परिदृश्यों, वनस्पतियों और जीवों को दर्शाती हैं। इस कला के बारे में बाहरी दुनिया को तब पता चला जब ब्रिटिशों ने 1930 के दशक में भूकंप के बाद टूटे हुए घरों में मधुबनी चित्रों को खोजा।

2. तंजौर चित्रकारी- तमिलनाडु:


यह चित्रकारी एक शास्त्रीय दक्षिण भारतीय चित्रकला शैली है जो 16 वीं शताब्दी में चोल साम्राज्य के राज्य काल में सांस्कृतिक विकास की ऊँचाई पर पहुँची। शुरू में ये भव्य चित्र राज भवनों की शोभा बढ़ाते थे, लेकिन बाद में ये घर-घर में सजने लगे। इसका जन्म तमिलनाडु के तंजावुर जिले से हुआ था तथा ये अपने जीवंत रंगों, समृद्ध सतहों और सजावटों के लिए जानी जाती हैं, जो ज्यादातर हिंदू देवताओं और देवियों पर आधारित होते हैं। इसकी दिलचस्प बात यह है कि मुख्य पात्र हमेशा लकड़ी के फ्रेम (Frame) के केंद्र में चित्रित होता है।

3. वारली चित्रकारी- महाराष्ट्र:


वारली लोक चित्रकला का जन्म 2500 ईसा पूर्व में भारत के पश्चिमी घाट महाराष्‍ट्र से वारली जनजातियों द्वारा हुआ। यह सरल और भारत के सबसे पुरानी कलाओं में से एक है। इसमें मुख्य रूप से कई आकार बनाने के लिए मंडलियों, त्रिकोण और वर्गों का उपयोग होता है तथा मछली पकड़ना, शिकार, त्योहारों, नृत्य आदि जैसे सामाजिक जीवन की गतिविधियों को दर्शाया जाता है। यह चित्रकारी वे मिट्टी से बने अपने कच्‍चे घरों की दीवारों को सजाने के लिए करते थे। सभी चित्र लाल या काले रंग की पृष्ठभूमि पर किए जाते हैं, जिसमें आकारों को केवल सफेद रंग से बनाया जाता था।

4. पट्टचित्र चित्रकारी- उड़ीसा:


पट्टचित्र लोक चित्रकला उड़ीसा राज्य से है। इसका उद्भव 8वीं शताब्दी के दौरान हुआ था और ये स्वदेशी कलाओं के सबसे शुरुआती स्वरूपों में से एक मानी जाती है। ‘पट्टा’ का शाब्दिक अर्थ है ‘कपड़ा’ और ‘चित्र’ का अर्थ ‘चित्र’ ही है, इसलिए इसमें चित्रों को कपड़े के ऊपर चित्रित किया जाता है। इनमें से अधिकतर चित्र हिंदू देवताओं की कहानियों को दर्शाते हैं। उड़ीसा पट्टचित्र कला की परंपरा भगवान जगन्नाथ और वैष्णव पंथ से निकटता से जुड़ी हुई है।

5. मुगल चित्रकारी- मुगल काल


मुगल चित्रकला भारतीय, फारसी और इस्लामी कला शैलियों का एक समन्वय दर्शाती है। यह कला 16वीं और 19वीं सदी के बीच विकसित हुयी। इसके अंतर्गत लड़ाई, अभिनंदन, दरबार के दृश्यों, शिकार दृश्यों, पौराणिक कहानियों, वन्यजीवन आदि को चित्रित किया गया है। दिलचस्प बात यह है कि लंदन में विक्टोरिया और अल्बर्ट संग्रहालयों में मुगल चित्रों का विशाल संग्रह है।

6. राजपूत चित्रकारी- राजपुताना:


18वीं शताब्दी में राजपूतों के शाही दरबारों में राजपूत चित्रकारी का विकास हुआ। इस कला में रामायण और महाभारत के दृश्य को दर्शाया जाता था। इन चित्रों के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले रंग सोने तथा चांदी, पत्थरों, खनिजों और पौधों के स्रोतों से प्राप्त किये जाते थे। यह एक लंबी प्रक्रिया थी जिसमें कभी-कभी हफ्तों का समय भी लग जाता था।

7. कलमकारी चित्रकारी- आंध्र प्रदेश:


कलमकारी आंध्र प्रदेश की अत्यंत प्राचीन लोक कला है और जैसा कि नाम से स्पष्ट है यह कलम की कारीगरी है, जिसे ‘पेन-आर्ट’ (Pen Art) के रूप में भी जाना जाता है। यह कला गोलकोण्डा सल्तनत के शासन के तहत विकसित हुई, जिसमें हाथ से सूती कपड़े पर रंगीन ब्लॉक से छाप बनाई जाती है। भारत में क़लमकारी के दो रूप प्रधान रूप से विकसित हुए हैं, वे हैं मछलीपट्नम क़लमकारी (मछलीपट्नम, आंध्र प्रदेश) और श्रीकलाहस्ति क़लमकारी (चित्तूर, आंध्र प्रदेश)। इसमें पुराण और रामायण के प्रसंगों को चित्रित किया जाता है।

8. गोंड चित्रकारी- मध्य प्रदेश:


मध्यप्रदेश की प्रसिद्ध जनजातियों में से एक, 'गोंड' द्वारा बानायी गयी चित्र कला को गोंड चित्रकला के नाम से जाना जाता है। गोंड कला में ज्यादातर जानवरों और पक्षियों की विशेषता, धार्मिक भावनाओं और रोजमर्रा की जिंदगी के चित्रण को दर्शाया जाता है जिन्हें बिंदुओं और रेखाओं की सहायता से बनाया जाता था। पहले इसमें कोयला, गाय का गोबर, पत्तियों तथा रंगीन मिट्टी से प्राप्त रंगो का उपयोग होता था परंतु अब ऐक्रेलिक पेंट्स (Acrylic paints) का इस्तेमाल किया जाता है।

9. लघु चित्रकारी- राजस्थान:


16वीं शताब्दी के आसपास मुगलों के उदय के साथ लघुचित्रों की विशिष्ट शैली का प्रचलन शुरू हुआ। मुगल लघुचित्रों में दरबारी दृश्य, शिकार चित्र आदि शामिल थे। मुगलकाल में शाहजहां और अकबर के शासन के तहत यह कला विकसित हुई। बाद में, इसे राजपूतों द्वारा अपनाया गया था और इस प्रकार राजस्थान की कला शैलियों ने भी लघुचित्र को विकसित किया। इन राजस्थानी लघुचित्रों के विषयवस्तु प्रकृति, विभिन्न भाव, पौराणिक व धार्मिक कथायें आदि है।

10. फड़ चित्रकारी- राजस्थान:

राजस्थान क्षेत्र में कपड़े या कैनवास (Canvas) की पृष्ठभुमि पर लोक देवता देवनारायण एवं पाबूजी आदि के जीवन पर आधारित एवं उनकी शौर्य गाथाओं पर बनाए जाने वाले पारम्परिक चित्र फड़ चित्र कहलाते हैं। इसमें केवल एक चित्र को चित्रित नहीं किया जाता है बल्कि देवताओं के जीवन और उनकी शौर्य गाथाओं को दर्शाया जाता है।

11. चेरियल स्क्रॉल पेंटिंग- तेलंगाना:


इसका उद्भव तेलंगाना के नाकाशी परिवार में हुआ था, जहां इसे कई पीढ़ियों तक पारित किया गया। लंबी स्क्रॉल और कलमकारी कला की परंपरा ने चेरियल स्क्रॉल पेंटिंग को प्रभावित किया। अन्य कलाओं के समान ही इसमें भी पुराणों और महाकाव्यों के आवश्यक दृश्यों को चित्रित किया जाता था परंतु ये चित्रण 40-45 फुट के स्क्रॉल पर किया जाता था।

12. कालीघाट चित्रकला- बंगाल:


कालीघाट चित्रकला हाल ही में खोजी गई पेंटिंग शैली है। इसकी उत्पत्ति कालीघाट से 19वीं शताब्दी के दौरान बंगाल में हुई थी। इन पेंटिंग में, कपड़े तथा पट्टों पर कूची, रंगद्रव्य तथा पेंट रंगों से शुरुआत में देवी-देवताओं को बनाने में प्रयोग होते थे, और बाद में सामाजिक जागरूकता बढ़ाने ले लिये सामान्य समाज के लोगों का बारीकी से बखूबी चित्रण किया।

यदि चित्रकला की बात हो रही हो और मेरठ का नाम ना आये ऐसा नहीं हो सकता। यहां की सरज़मीं कुशल कलाकारों से समृद्ध है, वे कलाकार, जिनके धार्मिक चित्रों वाले कैलेंडर्स (Calendars) की मांग पूरे देश में थी। धार्मिक और आध्‍यात्मिक कैलेंडर चित्रकला के रूप में जिन प्रमुख कलाकारों ने अपनी पहचान बनाई, वे हैं- योगेंद्र रस्तोगी और एस.एम. पंडित। आज भी मेरठ में इन कलाकारों को कैलेंडर कला शैली में योगदान के लिये जाना जाता है।

संदर्भ:
1.https://www.storypick.com/8-indian-art-styles/
2.https://www.thebetterindia.com/53993/10-indian-folk-art-forms-survived-paintings/
3.https://goo.gl/5PjdZw



RECENT POST

  • रक्षाबंधन और कोविड-19, रक्षाबंधन के बदलते रूप
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     31-07-2020 04:14 PM


  • रोपकुंड कंकाल झील
    नदियाँ

     31-07-2020 05:31 PM


  • ध्यान की अवस्था को संदर्भित करता है कायोत्सर्ग
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     31-07-2020 06:06 PM


  • क्या रहा समयसीमा के अनुसार, अब तक प्रारंग और मेरठ का सफर
    शुरुआतः 4 अरब ईसापूर्व से 0.2 करोड ईसापूर्व तक

     31-07-2020 08:25 AM


  • क्यों दी जाती है बकरीद पर कुर्बानी
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     31-07-2020 06:09 PM


  • एक सिक्के के दो पहलू: शहरीकरण बनाम स्वचालन
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     30-07-2020 03:50 AM


  • सौर ऊर्जा : अमृत ऊर्जा
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     29-07-2020 09:00 AM


  • कैसा होगा हज 2020?
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     28-07-2020 06:13 PM


  • क्या रहा मेरठ की वनस्पतियों के अनुसार, अब तक प्रारंग का सफर
    शारीरिक

     27-07-2020 08:00 AM


  • बायोरेमेडिएशन के लिए एक प्रभावी उपकरण ‘कवक’
    फंफूद, कुकुरमुत्ता

     27-07-2020 07:43 PM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.