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ताश के पत्तों से आधुनिक मुद्रा का निर्माण

मेरठ

 25-10-2018 12:29 PM
सिद्धान्त I-अवधारणा माप उपकरण (कागज/घड़ी)

आज पैसा जीवन का मूल आधार बन गया है। यदि देखा जाए तो इसके बिना जीवन संभव नहीं। विश्वम में लगभग 197 देश हैं, जिसमें से अधिकांश देशों की अपनी मुद्रा है। मुद्रा के मुख्यातः हमें दो स्वारूप देखने को मिलते हैं- सिक्केन और कागज़ी मुद्रा। इतिहास में जहाँ सिक्कोंा का प्रचलन देखने को मिलता है, वहीं ब्रिटिश साम्राज्यै के दौरान कागज़ी मुद्रा का प्रारंभ अत्यंरत रोचक रहा है, जिसके पीछे ताश के पत्तों का बड़ा योगदान था।

19वीं सदी के प्रारंभ में थॉमस डे ला रू द्वारा एक ताश छापने की कंपनी स्थारपित की गयी, जो आधुनिक डिज़ाइन (Design) के ताश ब्रिटिश सरकार के लिए तैयार करती थी। बाद में कंपनी को लंदन में स्थाीनांतरित किया गया। 1930 के दौरान डे ला रू कंपनी द्वारा अनेक बोर्ड गेम (Board Games) तैयार किये गये जिसमें कार्डों की डिज़ाइन, आकृति, रंगों में विभिन्नग परिवर्तन देखने को मिलते हैं। 1971 के दौरान यह कंपनी ब्रिटेन की अग्रणी खेल निर्माता कंपनियों में शामिल हो गयी।

यह कंपनी ब्रिटिश साम्राज्यं के उपनिवेशों के लिए स्टााम्पं प्रिंट करने लगी। 1860 में इनके द्वारा सर्वप्रथम विश्वा के लिए पहली कागज़ी मुद्रा मुद्रित की गयी। जो सर्वप्रथम अधिकारिक तौर पर मॉरिशस में जारी की गयी। यह मुद्रा ताश के पत्ते में उपयोग होने वाले कागज़ से बनाई गयी थी। ब्रिटिश बैंक की बैंक मुद्रा का निर्माण भी डे ला रू कंपनी द्वारा प्रारंभ कर दिया गया। 200 वर्ष के भीतर यह कंपनी विकास के विभिन्ना पड़ावों से गुजरते हुए, विश्वा के लगभग 150 देशों में यहां मुद्रित नोटों को उपयोग किया जाता है। 1947 में कंपनी को सर्वप्रथम लंदन स्टॉशक एक्चेंं ज (London Stock Exchange) में कंपनी के रूप में सूचित किया गया। 1958 में कंपनी का नाम ‘थॉमस डे ला रू एंड कंपनी लिमिटेड’ से परिवर्तित करके ‘दी डे ला रू कंपनी लि‍मिटेड’ (The De La Rue Company Limited) रख दिया गया। वर्तमान समय में कंपनी का मुख्यारलय हैम्पशशायर ब्रिटेन में स्थित है।

भारत में तैयार होने वाली मुद्रा का 95% कागज़ भी डे ला रू एंड कंपनी लि‍. से आयात किया जाता है क्योंरकि भारत में अब तक कोई भी कंपनी इस कागज़ को तैयार करने में सक्षम नहीं हो पायी है। नासिक में नोट प्रिंईटिंग प्रेस प्रारंभ होने से पूर्व भारत के नोट भी डे ला रू से छपकर आते थे। विगत कुछ वर्षों में भारत में नकली मुद्रा का प्रचलन तीव्रता से बढ़ गया, जिस कारण भारत सरकार द्वारा 2010 में इसे ब्लै कलिस्ट (Blacklist) में डाल दिया गया। इस वजह से कंपनी को बड़ी मात्रा में हानि का सामना करना पड़ा। लेकिन कुछ समय बाद भारत सरकार द्वारा संभवतः इसे ब्लै कलिस्ट से हटा दिया गया, हालाँकि इसका कोई पुख्ता ऐलान नहीं हुआ। भारत आज भी पेट्रोल, डीजल की भांति मुद्रा के कागज़ के लिए आयात पर निर्भर है।

जर्मनी तथा अन्यर देशों में इस पेपर को तैयार करने के प्रयास किये जा रहे हैं। डे ला रू कंपनी आज पासपोर्ट, सुरक्षित स्टासम्पय, ब्रांड प्रमाणीकरण इत्याेदि के क्षेत्र में भी व्याजपार करती है। 2018 में कंपनी ने अपने पेपर के व्यपवसाय को स्व,तंत्र रूप से व्यापार हेतु बेच दिया, जिसमें इनकी मात्र 10% हिस्सेवदारी है।

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संदर्भ :

1. https://www.pmgnotes.com/news/article/4743/From-Playing-Cards-to-Banknotes-The-History-of-Thomas-De-La-Rue/
2. https://en.wikipedia.org/wiki/De_La_Rue
3. http://www.wopc.co.uk/delarue/index
4. https://www.economist.com/business/2017/04/06/de-la-rue-rethinks-its-strategy
5. http://greatgameindia.com/secret-world-indian-currency-printers-de-la-rue/

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