Machine Translator

भारतीय ऊनी कढ़ाई का आधार इरान की पतेह कढ़ाई

मेरठ

 31-08-2018 02:54 PM
स्पर्शः रचना व कपड़े

वस्‍त्रों पर की जाने वाली कढ़ाई की परंपरा भारत में आज से ही नहीं वरन् सदियों पुरानी है। भारत में अनगिनत कढ़ाई के प्रकार प्रचलित हैं, जिनमें से एक है, ऊनी वस्‍त्रों पर की जाने वाली कढ़ाई। भारत में आज अनेक वस्‍त्र मीलें हैं, खासकर यदि मेरठ में ही देखें तो लगभग 100 से अधिक ऊनी वस्त्र मिलें तथा कपास के वस्त्रों पर कढ़ाई करने वाले कई हस्तशिल्प श्रमिक भी हैं। भारत में ऊनी कढ़ाई हिमालया क्षेत्र (प्रमुखतः जम्‍मू कश्‍मीर और हिमांचल) में की जाती है। यदि हम यहां के ऊनी वस्‍त्रों पर की जाने वाली कढ़ाई को बारिकी से देखें, तो यह इरान की "पतेह कढ़ाई " से समानता रखती हैं। चलिए जानें भारत में पतेह कढ़ाई के आगमन और विकास के विषय में।

7वीं शताब्‍दी में इस्‍लाम की विजय के पश्‍चात, प्राचीन इरानी धर्म (ज़रथुष्ट्र) के अनुयायी भारत में कश्‍मीर की ओर आ गये तथा साथ लाए अपनी पारंपरिक कढ़ाई, इनके द्वारा शॉलों पर की जाने वाली कढ़ाई भारत में कश्‍मीरी शॉल के नाम से प्रसिद्ध हुयी। शॉल के बॉर्डर पर की जाने वाली फूल, पत्तियों की कढ़ाई इनकी रचनात्‍मकता को दर्शाती है, तो वहीं "बोतेह कढ़ाई" (साइप्रस वृक्ष का डिजाइन) इनकी मजबूती का प्रतीक है, इन शॉलों को रंगने के लिए प्राकृतिक साधनों (अनार के छिलके, मजीठ, हिना आदि) का उपयोग करते थे। इनके द्वारा उपयोग की जाने वाली यह प्रक्रिया कश्‍मीरी शॉलों में साफ झलकती है। कश्‍मीर की प्रसिद्ध शॉल (पश्मिना) के पश्मिना शब्‍द की उत्पत्‍ती फारस (इरान) से हुयी है।

कश्‍मीर में इस कढ़ाई को उद्योग के रूप में कब प्रारंभ किया गया इसके कोई स्‍पष्‍ट प्रमाण नहीं हैं, किंतु 1900 के दशक में इस कढ़ाई को प्रसिद्ध‍ि मिलनी प्रारंभ हुयी, शुरूआती दौर में इस कढ़ाई की एक शॉल तैयार करने में पूर्णतः पारंगत व्‍यक्ति को भी 18 महीनें का वक्‍त लग जाता था, धीरे धीरे इसका प्रशिक्षण देना प्रारंभ किया गया तथा इसकी प्रक्रिया को अलग अलग लोगों के मध्‍य विभाजित (जैसे ऊन निकालना, शॉल का आधार तैयार करना, फिर उस पर सुई के माध्‍यम से कारिगरी करना) किया गया। ऊनी वस्‍त्रों (सूट, टोपी, शॉल आदि) पर की जाने वाली कश्‍मीरी कढ़ाई (फूल पत्तियों के डिजाइन) फैशन जगत में अपनी अलग प्रसिद्धि पा रहा है। तथा भारतीय अन्‍य हस्‍तशिल्‍प कारिगरों द्वारा जिस कढ़ाई को अपनाया जाता है उसका आधार कश्‍मीरी कढ़ाई या पतेह कढ़ाई ही होती है।

हांलांकि मेरठ में आज सबसे ज्‍यादा ऊनी वस्‍त्र मिल हैं किंतु उत्‍तर प्रदेश में पहली ऊनी वस्‍त्र मिल कानपूर (1876) में स्‍थापित की गयी और आज भारत के विभिन्‍न राज्‍यों में ऊनी वस्‍त्रों की मिलें हैं : जैसे
पंजाब - अमृतसर, गुरदासपुर, लुधियाना बेल्ट, पटियाला, धारवाल
महाराष्‍ट्र – मुंबई
जम्‍मू कश्‍मीर – श्रीनगर
राजस्थान- जयपुर, जोधपुर, बीकानेर

संदर्भ :

1.https://www.mrxstitch.com/patteh/
2.https://www.pinterest.ca/pin/849280442205651997/?lp=true
3.http://www.textileasart.com/exc_kash.htm
4.http://www.greenelephantcollection.com/index.php?route=articles/article&article_id=1
5.https://www.ntnews.com/Nipuna-Education/the-first-woolen-textile-mill-was-set-up-at-15-2-479760.aspx



RECENT POST

  • इस वर्ष पहली बार मनाया जायेगा, अंतर्राष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     22-09-2019 09:30 AM


  • कैसे सम्बन्ध है मेरठ और संगीत के पटियाला घराने में
    ध्वनि 1- स्पन्दन से ध्वनि

     21-09-2019 12:23 PM


  • गंध और शहरीकरण के बीच संबंध
    गंध- ख़ुशबू व इत्र

     20-09-2019 12:14 PM


  • भारतीय खेल पच्चीसी और चौपड़ का इतिहास एवं नियम
    हथियार व खिलौने

     19-09-2019 11:59 AM


  • भारतीय स्वास्थ्य सेवा द्वारा एंटीबायोटिक प्रतिरोध से लड़ने की पहल
    कीटाणु,एक कोशीय जीव,क्रोमिस्टा, व शैवाल

     18-09-2019 11:08 AM


  • क्या सम्बन्ध है आगरा की शान, पेठा और ताजमहल में
    स्वाद- खाद्य का इतिहास

     17-09-2019 11:09 AM


  • क्या हैं अनुवांशिक बीमारियां और उनके कारण?
    डीएनए

     16-09-2019 01:35 PM


  • आखिर कौन हैं भारत के मेट्रोमेन (Metroman)
    आधुनिक राज्य: 1947 से अब तक

     15-09-2019 02:27 PM


  • यमुना नहर से है आई.आई.टी. रुड़की का गहरा संबंध
    मध्यकाल 1450 ईस्वी से 1780 ईस्वी तक

     14-09-2019 10:30 AM


  • मेरठ शहर और इसमें फव्वारों का इतिहास
    उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

     13-09-2019 01:42 PM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.