उपलब्ध नौकरियों और बेरोज़गारी के बीच का अंतर

मेरठ

 10-05-2018 01:36 PM
नगरीकरण- शहर व शक्ति

भारत और खास करके उत्तर प्रदेश में एक बड़ी समस्या देखी जा रही है और यह दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, जैसे-जैसे भारत की जनस्संख्या बढ़ रही है। यह माना जा रहा है कि आने वाले 30 सालों में जनस्संख्या 1.2 अरब से 1.6 अरब हो जाएगी। ऐसा होने से भारत की अर्थव्यवस्था काफ़ी हद तक प्रभावित होगी और लोगों के लिए साधन काफ़ी कम हो जाएगा, वातावरण भी काफ़ी हद तक दूषित हो जाएगा जिससे अनेक प्रकार की बीमारियाँ जन्म लेना शुरू कर देंगी। लेकिन जिस बात का डर सबसे जयादा है वह है रोज़गार, इतने ज़्यादा आबादी होने से बहुत कम लोग ही कार्यरत रहेंगे; फिलहाल आबादी 1.2 अरब है लेकिन फ़िर भी हमारे पास शहर और ज़िले के स्तर पर रोजगार के आंकड़े का सही माप नहीं लगाया जा सका है।

हमारे देश में कुल 35 लाख औपचारिक नौकरियां (Formal Jobs) हैं और देश की कार्यशील आयु वाली जनस्संख्या 550 लाख है, इन 35 लाख कार्यों में से 23 लाख कार्य केन्द्रीय और राज्य सरकार के हैं और इनमें से भारतीय सेना सबसे बड़ी नियोक्ता है; बाकी के केवल 12 लाख कार्य नीजी क्षेत्र के हैं। बाकी भारत की बची हुई जनस्संख्या जो कि 500 लाख से अधिक है वे अनौपचारिक कार्यों में है और देहाड़ी वेतन पाते हैं। इस बढ़ती हुई जन्स्संख्या के कारण हर साल 12 लाख युवा 18 साल की उम्र के हो जाते हैं और रोजगार खोजने की जंग में जुट जाते हैं। हाल ही में हुए सर्वेक्षण से यह पता लगा कि भारत की 52.6 प्रतिशत आबादी बेरोजगार है और इनमें 18 से 24 साल के युवा भी हैं जो रोजगार ख़ोज रहे हैं।

भारत में काम परिदृश्य काफ़ी निराशाजनक है और बहुतों को औपचारिक कार्य में जुटने के लिए लम्बी कतारों में खड़ा होना पड़ता है, लेकिन फ़िर भी बहुत कम लोग ही रोजगार पाते हैं; लेकिन असल में सच थोड़ा अलग है। बेरोजगारी भारत में कई जगहों पर देखी जा सकती है, इसी कारण सरकारी विद्यालयों में 1 लाख शिक्षकों की कमी है। भारत भर में सरकार द्वारा संचालित प्राथमिक विद्यालयों में 18 प्रतिशत शिक्षकों के पद खाली हैं और माध्यमिक विद्यालयों में कुल 15 प्रतिशत पद खाली हैं। सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों का हर 6 में से 1 पद खाली है और इसी कारण पूरे भारत में कुल 1 लाख शिक्षकों की कमी हैं। कुछ राज्यों में सभी पद भरे हुए हैं और कुछ में आधे से ज़्यादा खाली हैं, जिन राज्यों में साक्षरता दर कम है वहां शिक्षकों की संख्या काफ़ी कम है। 2015-16 के शिक्षा डेटा के अनुसार 260 लाख स्कूल के बच्चों में से केवल 55 प्रतिशत सरकारी विद्यालयों में पढ़ते हैं। भारत के राज्यों में से झारखण्ड एक ऐसा राज्य है जहाँ पर शिक्षकों की कमी सबसे ज़्यादा है (70%)। उत्तर प्रदेश में आधे से ज्यादा माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों के पद खाली हैं, इसके बाद बिहार और गुजरात आते हैं।

शिक्षकों की कमी होने के पीछे भी एक कारण है -
कई राज्यों में शिक्षकों की नियमित रूप से भर्ती नहीं की जाती है, राज्य का सारक्षता दर कम होने से बहुत कम शिक्षक ही पढ़ाने के योग्य हैं, अलग-अलग विषयों के शिक्षकों को भरती करना बेहद मुश्किल है और यही कारण है कि राष्ट्र भर के सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों के कुल 6 लाख पद खाली पड़े हैं।

बिहार, झारखण्ड और उत्तर प्रदेश 333 लाख लोगों का घर है और इन राज्यों में बहुत कम प्राथमीक और माध्यमिक सरकारी विद्यालय हैं और यहाँ शिक्षकों की गंभीर ज़रुरत है; वहीं अगर गोवा, ओडिशा और सिक्किम जैसे राज्यों को देखें तो इन राज्यों में शिक्षकों का एक भी पद खाली नहीं है। आखिर ऊपर दी गई विसंगति के पीछे क्या कारण है? इसका उत्तर है ''शिक्षा का प्रकार''। हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था रोजगार के मुद्दे को जन्म दे रही है, बात तो यह है कि छात्र यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि वे पढाई किसलिए और क्यों कर रहे हैं, वे सामाज को कुछ देना चाहते हैं और फ़िलहाल इस बात से चिंतित हैं कि क्या उन्हें रोजगार मिलेगा। लोग यह मान रहे हैं कि भविष्य में लोगों को रोजगार न के बराबर मिलेगा और इसका कारण मशीन और रोबोट (Artificial Intelligence) का आना है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) द्वारा दी गयी रिपोर्ट से यह पता चला कि 2018 में भारत में कुल 18.6 लाख लोग बेरोजगार हैं और यह संख्या 2017 में कम थी (18.3 लाख)। हर वर्ष यह संख्या काफ़ी बढ़ रही है और यक़ीनन यह एक चिंता का विषय है। अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत का भविष्य रोजगार को खोजने के लिए धक्के खाएगा? क्या भारत पढ़े-लिखे लोगों को रोजगार देने में समर्थ होगा? क्या सब युवाओं को आने वाले सालों में रोजगार मिलेगा?

1. http://www.indiaspend.com/cover-story/indias-unfolding-education-crisis-government-schools-short-of-1-million-teachers-78319
2.https://www.firstpost.com/india/employability-in-india-talent-crunch-across-industry-forces-stakeholders-to-point-fingers-at-a-spiritless-education-system-4451127.html



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